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उद्भिज्ज का अर्थ

[ udebhijej ]
उद्भिज्ज उदाहरण वाक्य

परिभाषा

संज्ञा
  1. वृक्ष, लता आदि जो भूमि फोड़कर निकलते हैं:"भूमि में पड़ा हुआ बीज नमी मिलते ही उद्भिज्ज बन गया"
    पर्याय: उद्भिज, उद्भिद

उदाहरण वाक्य

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  1. उद्भिज्ज ( बीज से पैदा होने वाले )
  2. उद्भिज्ज में भोग नहीं होता , अत: इसे शरीर कहना ठीक नहीं है।
  3. उद्भिज्ज ] चार खानों और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है।।
  4. इनके अनुसार उद्भिज्ज ( जैसे पेड़-पौधे) को शरीर मानना उचित नहीं है, क्योंकि भोग (सुख-दु:ख की अनुभूति) केवल तीन शरीरों में ही होता है।
  5. समस्त भोग्य पदार्थ और अण्डज , स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज जो कुछ भी स्थावर, जंगम मनुष्यादि प्राणीमात्र उसी पराशक्ति से उत्पन्न हुए (ऐसी यह पराशक्ति है)।
  6. यह अविनाशी जीव ( अण्डज , स्वेदज , जरायुज और उद्भिज्ज ) चार खानों और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है॥ 2 ॥
  7. भावार्थ : - चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के ( स्वेदज , अण्डज , उद्भिज्ज , जरायुज ) जीव जल , पृथ्वी और आकाश में रहते हैं , उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत को श्री सीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ॥ 1 ॥
  8. भावार्थ : - चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के ( स्वेदज , अण्डज , उद्भिज्ज , जरायुज ) जीव जल , पृथ्वी और आकाश में रहते हैं , उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत को श्री सीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ॥ 1 ॥
  9. इस प्रकार समष्टि मनोभाव को प्राप्त हुआ हिरण्यर्भनामक ब्रह्म स्वयं ही ( दूसरे द्वारा बोध पाये बिना ही ) पूर्ववासना के अनुसार विराट्-भाव को , भुवन आदि भाव को और वहाँ पर स्वेदज , उद्भिज्ज , अण्डज और जरायुज रूप चार प्रकार के जीवभावों का नित्य संकल्प करता रहता है।
  10. इस प्रकार समष्टि मनोभाव को प्राप्त हुआ हिरण्यर्भनामक ब्रह्म स्वयं ही ( दूसरे द्वारा बोध पाये बिना ही ) पूर्ववासना के अनुसार विराट्-भाव को , भुवन आदि भाव को और वहाँ पर स्वेदज , उद्भिज्ज , अण्डज और जरायुज रूप चार प्रकार के जीवभावों का नित्य संकल्प करता रहता है।


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