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सुकेशा का अर्थ

सुकेशा अंग्रेज़ी में मतलब

उदाहरण वाक्य

  1. अथर्ववेद के एक उपनिषद् ( प्रश्नोपनिषद्) में प्रारंभ में ही कथा आती है कि सुकेशा भारद्वाज आदि छह ऋषि मुनिवर पिप्पलाद के पास गए और उनसे दर्शन संबंधी प्रश्न पूछे जिनका उन्होंने पांडित्यपूर्ण उत्तर दिया।
  2. सुकेशा , सत्यकाम , सौर्यायणि गार्ग्य , कौसल्य , भार्गव तथा कबंधी समेत छह ब्रह्म जिज्ञासुओं की जिज्ञासा को प्रश्नों का रूप दिया गया है जिनकी ज्ञान की तृप्ति महर्षि पिप्पलाद के उत्तरों द्वारा पूर्ण हो पा ई.
  3. सुकेशा , सत्यकाम, सौर्यायणि गार्ग्य, कौसल्य, भार्गव और कबंधी, इन छह ब्रह्मजिज्ञासुओं ने इनसे ब्रह्मनिरूपण की अभ्यर्थना करने के उपरांत उसे हृदयंगम करने की पात्रता के लिये आचार्य के आदेश पर वर्ष पर्यंत ब्रह्मचर्यपूर्वक तपस्या करके पृथक्-पृथक् एक एक प्रश्न किया।
  4. एक बार सत्यकाम , सुकेशा , भार्गव , आश्रलायन , कबंधी एवं सौर्यायणी ऋषिगण ब्रह्म के ज्ञान को जानने हेतु तथा वेदों के अध्ययन संबन्धी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए वह ऋषि पिप्पलाद के आश्रम में आते हैं .
  5. एक बार सत्यकाम , सुकेशा , भार्गव , आश्रलायन , कबंधी एवं सौर्यायणी ऋषिगण ब्रह्म के ज्ञान को जानने हेतु तथा वेदों के अध्ययन संबन्धी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए वह ऋषि पिप्पलाद के आश्रम में आते हैं .
  6. पश्न : मै जिस ब्रह्मंड की रचना करना चाहूँता हूँ , उसमे एक ऐसा कौन सा तत्व डाली जाय की जिसके न रहने पर मै स्वयं भी उसमे न रह सकूं / अर्थात मेरी सता स्पष्ट रूप से व्यक्त न रहे और जिसके रहने पर मेरी सता स्पष्ट प्रतीत होती रहे - - सुकेशा ?
  7. इस प्रकार सभी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए पिप्पलाद जी ने सभी की शंकाओं को दूर किया उनके ज्ञान द्वारा ऋषियों को ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान हो पाया मुनिगण सुकेशा आदि ऋषियों ने ऋषि पिप्लाद को धन्यवाद देते हुए बार-बार नमन किया तथा कृतज्ञ भाव को व्यक्त करते हुए उन्हें अपना गुरू स्वीकार किया .
  8. सुकेशा का प्रश्न सुनकर महर्षि उनसे कहते हैं हे सुकेशा तुम जिन सोलह कलाओं की बात कर रहे हो वह तो इस शरीर में ही विराजमान हैं यह कलाएं शरीर के अंत : करण में विद्यमान हैं उसे कहीं ओर खोजना व्यर्थ होता जिसे इन्हें जानने कि इच्छा होती है वह उसके हृदय में ही मिल जातीं हैं .
  9. सुकेशा का प्रश्न सुनकर महर्षि उनसे कहते हैं हे सुकेशा तुम जिन सोलह कलाओं की बात कर रहे हो वह तो इस शरीर में ही विराजमान हैं यह कलाएं शरीर के अंत : करण में विद्यमान हैं उसे कहीं ओर खोजना व्यर्थ होता जिसे इन्हें जानने कि इच्छा होती है वह उसके हृदय में ही मिल जातीं हैं .
  10. प्रश्नोपनिषद के छठे प्रश्न में सुकेशा भारद्वाज जी उनसे पूछते हैं हे ऋषिवर एक बार कौसल देश के राजपुरुष हिरण्यनाभ ने मुझसे एक प्रश्न किया था उसने मुझसे सोलह कलाओं से पूर्ण पुरुष के बारे में जानना चाहा किंतु मुझे ऎसे किसी व्यक्ति का भान नहीं है इस कारण मैं उन्हें इस प्रश्न का उत्तर न दे सका कृपा कर आप यदि किसी ऎसे पुरूष के बारे में जानते हैं जो सोलह कलाओं से पूर्ण हो तो उसका ज्ञान मुझे भी प्रदान करें
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