कुलहीन का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- ‘‘ अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणीक होना , निर्धनता , अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना , नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।
- पास रहने वाला कैसा ही विद्याहीन , कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसी से हित करने लगता है , क्योंकि राजा , स्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है , उसी का आश्रय कर लेते हैं।
- पास रहने वाला कैसा ही विद्याहीन , कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसी से हित करने लगता है , क्योंकि राजा , स्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है , उसी का आश्रय कर लेते हैं।
- ्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणीक होना , निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।'' गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
- ्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणी होना , निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।'' गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
- वह एकदम बोल उठी , ' नहीं , नहीं संधान मत करना . ' वह चकित रुक गया . ' मैं कुलहीन से विवाह नहीं करूँगी . ' पल भर में सारी स्निग्धता , वितृष्णा बन गई , अमृत विष में परिणत हो गया .
- इसका सार है कि ऋषिगण माता पार्वती को शिव के बारे कहते हैं कि - ” नारदजी के वचनों पर विश्वास कर तुम ऐसा पति चाहती हो जो ( शिव) स्वभाव से ही गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेश वाला, नर-कपालों की माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखनेवाला है।
- ब्याली॥ इसका सार है कि ऋषिगण माता पार्वती को शिव के बारे कहते हैं कि - ” नारदजी के वचनों पर विश्वास कर तुम ऐसा पति चाहती हो जो ( शिव) स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेश वाला, नर-कपालों की माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखनेवाला है।
- ( अच्छा ) यह तो बताओ कि क्या सुनकर तुम ऐसे कुलहीन वरपर रीझ गयी , जो गुरहित , प्रतिष्ठारहित और माता-पितारहित है ॥ 49 ॥ वे शिवजी तो भीख माँगकर खाते हैं , नित्य ( श्मशानमें ) चिता ( भस्म ) पर सोते हैं , नग्न होकर नाचते हैं और पिशाच-पिशाचिनी इनके दर्शन किया करते हैं ' ॥ 50 ॥
- ( 1 ) नन्द वंश - शूद्र ( 2 ) मौर्य वंश - अज्ञात कुलशील ( चाणक्य चन्द्रगुप्त को ' वृषल - कुलहीन ' कहता है ) ( 3 ) गुप्त वंश - वैश्य ( 4 ) वर्धन वंश - वैश्य यहाँ तक कि राजपूतों के विभिन्न वंश भी आक्रमणकारी आर्य वंशों जैसे शक , हूण , गुर्जर को संस्कारित कर क्षत्रिय जाति में समाहित करने पर बने।