पुंगव का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि पुंगव श्री सुधासागर महाराज जी का वर्षायोग 2012 धार्मिक नगर ललितपुर ( उत्तर प्रदेश) में क्षेत्रपाल जी मंदिर में 20 वर्ष बाद हो रहा है | इसके पूर्व में सन 1991 एवं 1993 में चातुर्मास हो चूका है |
- इसका उदाहरण तो हमारा वामपंथी कवि पुंगव मंगलेश डबराल ही है जो र स स के मंच पर भी अपनी बात रख आया और अब अपनों का हमला ऐसे झेल रहा है जैसे निछद्दम में खड़ी भैंस ओलों भरी बरसात की बूंदें झेलती है और दूध भी देती है ।
- अन्नपूर्णा जी ) की इन लाइनों पर भी गौर फरमाएं - बीर रहे बलवान रहे वर बुद्धि रही बहु युद्ध सम्हारे | पूरण पुंज प्रताप रहे सदग्रन्थ रचे शुभ पंथ सवारे || धाक रही धरती तल पे नर पुंगव थे पुरुषारथ धारे | बापके बापके बापके बापके बापके बाप हमारे ||
- समाज की सच्ची श्रद्धा , आराधना एवं प्रार्थना के परिणामस्वरूप संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से श्री ज्ञानोदय तीर्थ के प्रेरणास्त्रोत मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री गम्भीर सागर जी क्षुल्लक श्री धैर्य सागर जी महाराज एवं ब्रह्मचारी संजय जी का सन 1997 में क्षेत्र पर प्रथम वर्षायोग हुआ।
- मैं जानता हूँ मेरे कुछ मित्र भी जो इसी कटेगरी के हैं यह पढ़कर मुझ पर सठियाने का आरोप लगायेगें उनके लिए बता दूं कि ब्लॉगर पुंगव ( श्रेष्ठ ) अनूप शुक्ल जी मुझे पहले ही चिर युवा की संज्ञा/विशेषण दे चुके हैं ....और अभी तो मैं पचपन का भी नहीं हुआ ...पचपन मानें बचपन ! :)
- अन्नपूर्णा जी ) की इन लाइनों पर भी गौर फरमाएं - बीर रहे बलवान रहे वर बुद्धि रही बहु युद्ध सम्हारे | पूरण पुंज प्रताप रहे सदग्रन्थ रचे शुभ पंथ सवारे|| धाक रही धरती तल पे नर पुंगव थे पुरुषारथ धारे| बापके बापके बापके बापके बापके बाप हमारे || स्वागत वसंत.......... आगामी ८ फरवरी को वसंत पंचमी है .
- आदरणीय मिश्राजी आपके श्रेणी विभाजन पर गौर करने पर हम तकरीबन चौथी किस्म के नर पुंगव की श्रेणी में अपने आपको देख पा रहे हैं ! अब हँसे या शोक मनाएं ! अब तो सारी आशा आपके इसी भरोसे पर टिकी हैं ! “हे मेरे चंद्र्शीर्ष पुरूष मित्रों तुम कतई उदास न होना अगले अंक में आप के लिए एक जबरदस्त ख़बर है” जल्दी बताओ आप तो !
- यदि अनुवाद वेदों में ही दिए होते तो आपको लेने ( करने) की क्या आवश्यकता थी? यदि अनुवाद वेद में ही होता तो वह “वाद” ही रहता, “अनु” वाद न बनता! और इस पर शास्त्रार्थ का खुला आह्वान! आपकी वाणी के माधुर्य (!) और तेज के चलते कौन ऐसा नर पुंगव होगा जो आपकी इस चुनौती को स्वीकार कर सके? आपकी प्रतिक्रिया किसी विद्वान् की प्रति-प्रतिक्रिया की अपेक्षा तो नहीं रखती परन्तु और पाठकों के भ्रमोच्छेदन के निमित्त हम आपसे वार्तालाप करने को उद्यत हैं.