मसृण का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- कविता महान जोसफ , जब उसने तेरे पवित्र शरीर को वृक्ष से नीचे लाया, मसृण मखमल में लपेटा, मसालों के साथ लेप किया, और इसे नए मकबरे में रख दिया.
- जरा सन १९५० के काव्य परिदृश्य को निहारिये , हमारे महान गीतकारों की आत्ममुग्धता की मसृण छलना के उद्गारों को देखिए और तुलना कीजिए निराला के उसी काल के इन गीतांशों से:-
- ‘ मधुशाला ' की प्रत्येक पंक्ति सर्प की काया के समान सुचिक् कण , मसृण और लहरदार है- आदि से अंत तक सुसंबद्ध , गतिशील , पिछला शब्द अगले शब्द को गतिशील बनाता हुआ।
- ‘ मधुशाला ' की प्रत्येक पंक्ति सर्प की काया के समान सुचिक् कण , मसृण और लहरदार है- आदि से अंत तक सुसंबद्ध , गतिशील , पिछला शब्द अगले शब्द को गतिशील बनाता हुआ।
- तृण तृण की मसृण भक्ति भाव खींच लाया ।तूने जब टेर प्रिये , 'कान्त, उठो' गाया ! मगध वा सूत गये, किन्तु स्वर्ग-दूत नये, तेरे स्वर पूत अये, मैंने भर पाया ।तूने जब टेर प्रिये, 'कान्त, उठो' गाया ।
- जरा सन १ ९ ५ ० के काव्य परिदृश्य को निहारिये , हमारे महान गीतकारों की आत्ममुग्धता की मसृण छलना के उद्गारों को देखिए और तुलना कीजिए निराला के उसी काल के इन गीतांशों से : - ( क )
- चनों के वारि से होकर सचेत , लगे करने विलाप यों- हन्त ! वृन्त-विकसित कुसुम को काल ने काल से ही पूर्व कर डाला छिन्न-भिन्न है भग्न मनोरथ अब मग्न हुआ जाता हूँ ओक-लोक-शून्य महाशोक के समुद्र में जिस भांति करि-अपहृत कुवलय का मसृण मृणाल-तन्तु लय होता जल में।
- धीरे-धीरे धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ- केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वांत में ; केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध मुक्ति का , सीमाहीन खुलेपन का ही।
- डॉ . नगेन्द्र प्रयोगवाद के उत्थान के विषय में लिखते हैं , - ” भाव क्षेत्र में छायावाद की अतिन्द्रियता और वायवी सौंदर्य चेतना के विरुद्ध एक वस्तुगत , मूर्त और ऐन्द्रिय चेतना का विकास हुआ और सौंदर्य की परिधि में केवल मसृण और मधुर के अतिरिक्त परुष , अनगढ़ , भदेश का समावेश हुआ।
- किन्तु कालान्तर में ही स्थितप्रज्ञ-अग्रणी रामचन्द्र उर-मणि लक्ष्मण-वियोग में , प्रवाहित वारिज-विलोचनों के वारि से होकर सचेत , लगे करने विलाप यों- हन्त ! वृन्त-विकसित कुसुम को काल ने काल से ही पूर्व कर डाला छिन्न-भिन्न है भग्न मनोरथ अब मग्न हुआ जाता हूँ ओक-लोक-शून्य महाशोक के समुद्र में जिस भांति करि-अपहृत कुवलय का मसृण मृणाल-तन्तु लय होता जल में।