लोढ़ी का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- जब फसल कटने के दिन आएँ धान के ढेर लगे हों घर द्वार लोढ़ी संक्राति और पोंगल लाए पके धान की बयार बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना।
- हिन्दुओं में , बल्कि यों कहना चाहिए कि परंपरावादी हिन्दुओं में , यह रिवांज है कि लोढ़ी की रात से एक दिन पहले छोटी-छोटी बच्चियां अपने मुहल्लों के बुंजुर्गों और दुकानदारों के पास टोलियों में जाकर लोढ़ी मनाने के लिए पैसे ( मो ) मांगती हैं।
- हिन्दुओं में , बल्कि यों कहना चाहिए कि परंपरावादी हिन्दुओं में , यह रिवांज है कि लोढ़ी की रात से एक दिन पहले छोटी-छोटी बच्चियां अपने मुहल्लों के बुंजुर्गों और दुकानदारों के पास टोलियों में जाकर लोढ़ी मनाने के लिए पैसे ( मो ) मांगती हैं।
- नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार , जब फ़सल कटने के दिन आयें, धान के ढेर लगे हों घर द्वार , लोढ़ी, संक्राति और पोंगल लाये पके धान की बयार, बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार, तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना, मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना ।
- नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार , जब फ़सल कटने के दिन आयें, धान के ढेर लगे हों घर द्वार , लोढ़ी, संक्राति और पोंगल लाये पके धान की बयार, बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार, तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना, मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना ।
- ताऊ आज तो थमने सिल्ला लोढ़ी ही बजा दिए ! भाई ताऊ चाल्हा सा काट दिया आज तो ! इस गधे की कहानी तो हम समझ गए ! थारा इशारा किधर सै ! गजब ताऊ गजब ! जीते रहो ! और लिखते रहो ! हमने उम्मीद नही करी थी की इस को आप इतने सुंदर ढंग से बता दोगे !
- चाँद अरे क्या रूप है- कैसी शीतल रौशनी , अपनी कलंक लेकर- जग में बैठी विश्वरानी || सूरज से गुण लेकर- अपने में इठलाती हों, दिल मे तेरे कोई मोल नहीं- जग को सिर्फ हँसाती हो || किसीने सच कहा- भूख की रोटी हो तू, जली हुई, झलसी हुई- मरिचीका हैं तू || कितने बच्चों का लोढ़ी हैं तू- कितने शायरों का ख्वाब है तू, कितने बनीता के सिंदूर हैं तू- पर, अपने आप कलंक है तू || ********