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शफ़ा का अर्थ

शफ़ा अंग्रेज़ी में मतलब

उदाहरण वाक्य

  1. नमाज़े शब या नमाज़े तहज्जुद एक मुसतहब्बी नमाज़ है जिस की गयारह रकतें हैं आठ रकअत नमाज़े शब की नीयत से , दो रकअत नमाज़े शफ़ा की नीयत से और एक रकअत नमाज़े वित्र की नीयत से पढ़ी जाती है, नमाज़े शफ़ा के अंदक क़ुनूत नही होता और नमाज़े वित्र एक रकअत है जिस में कुनूत के साथ चालीस मोमिनीन का नाम लिया जाता है।
  2. नमाज़े शब या नमाज़े तहज्जुद एक मुसतहब्बी नमाज़ है जिस की गयारह रकतें हैं आठ रकअत नमाज़े शब की नीयत से , दो रकअत नमाज़े शफ़ा की नीयत से और एक रकअत नमाज़े वित्र की नीयत से पढ़ी जाती है, नमाज़े शफ़ा के अंदक क़ुनूत नही होता और नमाज़े वित्र एक रकअत है जिस में कुनूत के साथ चालीस मोमिनीन का नाम लिया जाता है।
  3. नमाज़े शब या नमाज़े तहज्जुद एक मुसतहब्बी नमाज़ है जिस की गयारह रकतें हैं आठ रकअत नमाज़े शब की नीयत से , दो रकअत नमाज़े शफ़ा की नीयत से और एक रकअत नमाज़े वित्र की नीयत से पढ़ी जाती है , नमाज़े शफ़ा के अंदक क़ुनूत नही होता और नमाज़े वित्र एक रकअत है जिस में कुनूत के साथ चालीस मोमिनीन का नाम लिया जाता है।
  4. नमाज़े शब या नमाज़े तहज्जुद एक मुसतहब्बी नमाज़ है जिस की गयारह रकतें हैं आठ रकअत नमाज़े शब की नीयत से , दो रकअत नमाज़े शफ़ा की नीयत से और एक रकअत नमाज़े वित्र की नीयत से पढ़ी जाती है , नमाज़े शफ़ा के अंदक क़ुनूत नही होता और नमाज़े वित्र एक रकअत है जिस में कुनूत के साथ चालीस मोमिनीन का नाम लिया जाता है।
  5. तर्जुमा : यक़ीन के साथ जान लो कि कोई भी क़ुरआन के बाद फ़ाक़ा कशी नहीं और इस से क़ब्ल कोई ग़नी नहीं पस अपने अमराज़ की शफ़ा उस से तलब करो और अपने ठिकानों और पनाह गाहों के लिये उस से मदद तलब करो पस यक़ीनन उस में सब से बड़े अमराज़ की शफ़ा है और वह क़ुफ़्र , निफ़ाक़ , जहालत , और ज़लालत व गुमराही है।
  6. तर्जुमा : यक़ीन के साथ जान लो कि कोई भी क़ुरआन के बाद फ़ाक़ा कशी नहीं और इस से क़ब्ल कोई ग़नी नहीं पस अपने अमराज़ की शफ़ा उस से तलब करो और अपने ठिकानों और पनाह गाहों के लिये उस से मदद तलब करो पस यक़ीनन उस में सब से बड़े अमराज़ की शफ़ा है और वह क़ुफ़्र , निफ़ाक़ , जहालत , और ज़लालत व गुमराही है।
  7. क़ुम एक कूफ़ा-ए-सग़िर है , जन्नत के आठ दरवाजों में से तीन क़ुम की तरफ़ खुलते हैं , फिर इमाम ( अ : स ) ने फ़रमाया , मेरी औलाद में से एक औरत जिस की शहादत क़ुम में होगी और इसका नाम फ़ातिमा बिन्त मूसा होगा और इस की शफ़ा ' अत से हमारे तमाम शिया जन्नत में दाख़िल हो जायेंगे ( बेहार जिल्द 60 , पेज 288 )
  8. ख़ुत्बा 198 में फ़रमाते हैं : “ व दवाओ लेसा बादहू दा ” यअनी क़ुरआने मजीद ऐसी दवा है कि जिस के बाद कोई दर्द रह नहीं जाता यह दवा भी यक़ीनन उस वक्त अपना असर दिखाएगी जब हज़रत ( अ.स. ) के इस फ़रमान और क़ुरआने हकीम के शफ़ा बख़्श होने पर ईमान हो बाअल्फ़ाज़े दीगर हमे अपने पूरे वुजूद के साथ बावर करना चाहिये कि हमारा तमाम तर इन्फ़िरादी व इज्तेमाई दर्दों और मुश्किलात का हक़ीक़ी इलाज क़ुरआने हकीम में है।
  9. बेदम हुए बीमार दवा क्यों नही देते तुम अच्छे मसीहा हो शफ़ा क्यों नहीं देते दर्दे-शबे-हिज्राँ की जज़ा क्यों नहीं देते खूने-दिले-वोशी का सिला क्यों नहीं देते मिट जाएगी मखलूक़ तो इंसाफ़ करोगे मुंसिफ़ हो तो अब हश्र उठा क्यों नहीं देते हाँ नुक्तावरो लाओ लबो-दिल की गवाही हाँ नग़मागरो साज़े-सदा क्यों नही देते पैमाने-जुनूँ हाथों को शरमाएगा कब तक दिलवालो गरेबाँ का पता क्यों नहीं देते बरबादी-ए-दिल जब्र नहीं ' फ़ैज़ ' किसी का वो दुश्मने-जाँ है तो भुला क्यों नहीं देते
  10. मैं तिड़क गई लोकां दी खेड फिर मिट्टी दी मिट्टी क्या बताऊं क्या बताऊं इन आंखों ने क्या मंज़र देखा धरती के सीने में उतरता खंजर देखा जिस धरती पे थे उगते फूल शफ़ा के उस धरती पे लहू का समंदर देखा क्या पूछते हो , क्यूं आंखें नम हैं उस समंदर को भीतर उफनते देखा दिल से हल्की सी इक आह निकली आह को बवंडर में बदलते देखा कल था देखा बच्चे भागें पतंग के पीछे आज उन हाथों में लहू सना खंजर देखा क्या बताऊं इन आंखों ने क्या मंज़र देखा धरती के सीने में उतरता खंजर
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