×

अलोभ का अर्थ

अलोभ अंग्रेज़ी में मतलब

उदाहरण वाक्य

  1. फिर वनपर्व ( 2.75 ष् में दशलक्षण धर्म की परवर्ती शैली में अष्टविध , आठ तरह के धर्म का विवरण है- ‘ इज्याध्ययनदाननि तपः सत्यं क्षमा दमः , अलोभ इति मार्गोयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ' अर्थात धर्म आठ तरह का बताया गया है- यज्ञ , अध्ययन , दान , तपस्या , सत्य , क्षमा , दम और अलोभ।
  2. फिर वनपर्व ( 2.75 ष् में दशलक्षण धर्म की परवर्ती शैली में अष्टविध , आठ तरह के धर्म का विवरण है- ‘ इज्याध्ययनदाननि तपः सत्यं क्षमा दमः , अलोभ इति मार्गोयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ' अर्थात धर्म आठ तरह का बताया गया है- यज्ञ , अध्ययन , दान , तपस्या , सत्य , क्षमा , दम और अलोभ।
  3. प्रतिज्ञा पालन , देश और काल का ज्ञान , नागरिकता , अदैन् य न मांगना , अधिक न हंसना , चुगली न करना , निंदा न करना , क्रोध न करना , अलोभ , आदरणीयों का आदर करना , चंचलता का अभाव , पहले न बोलना , कामशास् त्र में कौशल , कामशास् त्र से संब ंधित क्रियाओं , नृत् य-गीत आदि में कुशलता .
  4. प्रतिज्ञा पालन , देश और काल का ज्ञान , नागरिकता , अदैन् य न मांगना , अधिक न हंसना , चुगली न करना , निंदा न करना , क्रोध न करना , अलोभ , आदरणीयों का आदर करना , चंचलता का अभाव , पहले न बोलना , कामशास् त्र में कौशल , कामशास् त्र से संब ंधित क्रियाओं , नृत् य-गीत आदि में कुशलता .
  5. चलिये , मैं एक बार अपने और आपके फायदे के लिये लिख दूं वे गुणसूत्र जो चरित्र/सफलता के मूल में हैं - युगों से संचित सत्य-ज्ञान पर विश्वास सत्य, मधुर और हितकर वाणी प्रसन्नता, मृदुता, मौन, आत्मसंयम और आत्म शुद्धि अभय (निर्भयता), दान, अध्ययन, तपस्या, सरलता, क्रोध का उत्तरोत्तर अभाव और शान्ति अनिन्दा, दया, अलोभ, धीरता और क्षमा साहस, पवित्रता, विश्वस्तता की प्रचुरता और अभिमान का अभाव।
  6. अहिंसा सत्यमक्रोधस्लाग शांतिपेंशुनम् दया भूतेष्वयलोलुप्ल मार्दवं ह्रीरचापलम् तेज : क्षमा धृति : शौचमद्रोहो नातिमानिता भवन्ति संपदं : दैवीमभिजातस्य भारत हे भारत ! - अर्जुन को कृष्ण ने कहा - हे भारत , अभय , चित्तशुद्धि , योगानुराग , दान , संयम , यश , स्वाध्याय , तप , सरलता , अहिंसा , सत्य , अक्रोध , त्याग , शांति , अलोभ , अहंकारशून्यता , ही अर्थात असत कार्यो में सहज संकोच , अचंचलता , तेज , क्षमा , धृति अर्थात सुख - दुख में अविचलभाव , अद्रोह ये सब दिव्यपुरुष के लक्षण है।
  7. अहिंसा सत्यमक्रोधस्लाग शांतिपेंशुनम् दया भूतेष्वयलोलुप्ल मार्दवं ह्रीरचापलम् तेज : क्षमा धृति : शौचमद्रोहो नातिमानिता भवन्ति संपदं : दैवीमभिजातस्य भारत हे भारत ! - अर्जुन को कृष्ण ने कहा - हे भारत , अभय , चित्तशुद्धि , योगानुराग , दान , संयम , यश , स्वाध्याय , तप , सरलता , अहिंसा , सत्य , अक्रोध , त्याग , शांति , अलोभ , अहंकारशून्यता , ही अर्थात असत कार्यो में सहज संकोच , अचंचलता , तेज , क्षमा , धृति अर्थात सुख - दुख में अविचलभाव , अद्रोह ये सब दिव्यपुरुष के लक्षण है।
अधिक:   पिछला  आगे


PC संस्करण
English


Copyright © 2023 WordTech Co.