आसूदगी का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- किताबों की दुनिया - 65 पहले की बात है मैंने एक शेर कहा था : संजीदगी , वाबस्तगी , शाइस्तगी , खुद-आगही आसूदगी , इंसानियत , जिसमें नहीं , क्या आदमी ( वाबस्तगी : सम्बन्ध , लगाव , शाइस्तगी : सभ्यता , खुद-आगही : आत्मज्ञान , आसूदगी : संतोष ) कहने बाद म. ..
- नीरज किताबों की दुनिया - 65 पहले की बात है मैंने एक शेर कहा था : संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी (वाबस्तगी: सम्बन्ध, लगाव, शाइस्तगी: सभ्यता, खुद-आगही: आत्मज्ञान, आसूदगी:संतोष) कहने बाद मैंने सोचा के इस शेर में जो आदमी की इतनी खूबियाँ बयाँ की हैं वो कहीं एक साथ मिलती भी हैं?
- तो जिन बातों को मैंने वाज़ेह किया है उनमें ग़ौर व फ़िक्र करना वरना अगर हस्बे मन्शा फ़िक्र व नज़र का फ़राग़ ( आसूदगी ) हासिल नहीं हुआ है तो याद रखो के इस तरह सिर्फ़ ‘ ाबकोर ऊंटनी की तरह हाथ पैर मारते रहोगे ; और अन्धेरे में भटकते रहोगे और दीन का तलबगार वह नहीं है जो अन्धेरों में हाथ पांव मारे और बातों को मख़लूत कर दे , इससे तो ठहर जाना ही बेहतर है।
- फिराक गोरखपुरी की गजल बन्दगी से कभी नहीं मिलती इस तरह ज़िन्दगी नहीं मिलती लेने से ताज़ो-तख़्त मिलता है मांगे से भीख भी नहीं मिलती एक दुनिया है मेरी नज़रों में पर वो दुनिया अभी नहीं मिलती जब तक ऊँची न हो जमीर की लौ आँख को रौशनी नहीं मिलती तुझमें कोई कमी नहीं पाते तुझमें कोई कमी नहीं मिलती यूँ तो मिलने को मिल गया है ख़ुदा पर तेरी दोस्ती नहीं मिलती बस वो भरपूर जिन्दगी है ' फ़िराक़' जिसमें आसूदगी नहीं मिलती
- तुझमें कोई कमी नहीं पाते फिराक गोरखपुरी की गजल बन्दगी से कभी नहीं मिलती इस तरह ज़िन्दगी नहीं मिलती लेने से ताज़ो-तख़्त मिलता है मांगे से भीख भी नहीं मिलती एक दुनिया है मेरी नज़रों में पर वो दुनिया अभी नहीं मिलती जब तक ऊँची न हो जमीर की लौ आँख को रौशनी नहीं मिलती तुझमें कोई कमी नहीं पाते तुझमें कोई कमी नहीं मिलती यूँ तो मिलने को मिल गया है ख़ुदा पर तेरी दोस्ती नहीं मिलती बस वो भरपूर जिन्दगी है ' फ़िराक़' जिसमें आसूदगी नहीं मिलती
- जिसे चाहा नहीं था वह मुक़द्दर बन गया अपना कहाँ बुन्याद रखी थी कहाँ घर बन गया अपना लिपट कर तुन्द मौजौं से बड़ी आसूदगी पायी ज़रा साहिल से क्या निकले समुन्दर बन गया अपना कोई मंज़र हमारी आँख को अब नम नहीं करता होए क्या हादसे जो दिल ही पत्थर बन गया अपना हिजूम-ऐ-शेहर में देखा तो हम ही हम नज़र आए बनाया नक़्श जब उसका तो पैकर बन गया अपना चले थे एतेमाद आसाऐषों की आर्ज़ु लेकर ना जाने कौन्सा सेहरा मुक़द्दर बन गया अपना तुन्द =