तपसा का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- मुंडकोपनिषद के तीन अर्थयुक्त शब्द है- ‘ तपसा चीयते ब्रह्म ' , अर्थात चिंतन की शक्ति से ब्रह्म का विस्तार होता है तथा चेतना की स्वतंत्रता से चिंतन की शक्ति का।
- यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥ जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और निगल जाती है , जैसे पृथिवी में औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुष से केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षर से यह विश्व प्रकट होता है ॥ 7 ॥ तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
- जिस शाला या आवास के वासी वेदमन्त्र के जिन चार चक्रों पर अपनी शाला को चलाना सीख जाते हैं वे “ श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्त ऋते श्रिताः ” ( अथर्व ० १ २ . ५ , १ ) अर्थात् परिश्रम , प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए संकल्पारूढ़ रहना , वेदादि सत्शास्त्रों का ज्ञान और सात्विक कमाई ही वे पहिये हैं जो परिवार के भारी भार को हल्का-फुल्का बना देते हैं और नीतिकार का कथन सार्थक हो उठता है ।