तुन्द का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- अलबत्ता तलहा और ज़ुबैर की हल्की से बल्कि रफ़्तार भी तुन्द व तेज़ थी , और नर्म से नर्म आवाज़ भी सख्ती व दुरुश्ती ( कठोरता व निर्दयता ) लिये हुए थी , और उन पर आइशा को भी बेतहाशा गुस्सा था।
- रात तारीकियों का पहरा थामेरी खिड़की के दोनों दरवाज़ेहवा के तुन्द झोंकों से लड़ रहे थेचंद जुगनू कभी चमक करकेतीरगी से भरी मेरी कोठरी मेंखैरात में रौशनी के चंद टुकड़े उंडेल देते थेसारी दुनिया थी अपने ख़्वाबों मेंमैं तुम्हारे ख़्यालों में जागता ही रहावक्त की . ..
- रात तारीकियों का पहरा थामेरी खिड़की के दोनों दरवाज़ेहवा के तुन्द झोंकों से लड़ रहे थेचंद जुगनू कभी चमक करकेतीरगी से भरी मेरी कोठरी मेंखैरात में रौशनी के चंद टुकड़े उंडेल देते थेसारी दुनिया थी अपने ख़्वाबों मेंमैं तुम्हारे ख़्यालों में जागता ही रहावक्त की
- तारिख़े इब्ने असाकर ( शाफ़ेई ) मेंइस तरह रिवायत की गयी है जिस वक़्त क़ायमें आले मुहम्मद ( अ ) ज़हूर फ़रमायेगें पस ख़ुदा वंदे आलम मशरिक़ व मग़रिब वालों को इस तरह जमा फ़रमायेगा जिस तरह मौसमे ख़रीफ़ की तेज़ व तुन्द बारिश होती है।
- सो इनमें से बअज़ों पर तो हमने तुन्द हवा भेजी और इनमें से बअज़ों को हौलनाक आवाज़ ने आ दबाया और इनमें से बअज़ों को हमने में धँसा दिया और इनमे से बअज़ों को हमने डुबो दिया और अल्लाह ऐसा न था कि इन पर ज़ुल्म करता बल्कि यही लोग अपने ऊपर ज़ुल्म करते थे . ”
- बोल कि थोड़ा वक्त बहुत है बोल , कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल, ज़बां अब तक तेरी है तेरा सुतवां जिस्म है तेरा बोल, कि जाँ अब तक तेरी है देख कि आहन-गर की दुकां में तुन्द हैं शोले, सुर्ख हैं आहन खुलने लगे कुफ्लों के दहाने फैला हर इक ज़ंजीर का दामन बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है ज़िस्मों ज़ुबां [...]
- Faizबोल कि लब आज़ाद हैं तेरेबोल ज़बान अब तक तेरी है तेरा सुत्वां जिस्म है तेराबोल कि जान अब तक तेरी है देख के आहनगर कि दुकाँ में तुन्द हैं शोले सुर्ख है आहनखुलने लगे हैं कुफ़लों के दहाने फैला है एक जंजीर का दामन बोल के ये दा-वक़्त बहोत हैजिस्म-ओ-जाबाँ की मौत से पहले बोल कि सच जिंदा है अब तक बोल जो कुछ कहानी है कह {सुत्वां -
- अलबत्ता उनके बारे में तल्हा व ज़ुबैर की हल्की से हल्की रफ़्तार भी तुन्द व तेज़ थी और नर्म से नर्म आवाज़ भी सख़्ती व दरश्ती लिये हुए थी , और उन पर आइशा को भी बेतहाशा ग़ुस्सा था चुनांचे एक गिरोह आमादा हो गया और उसने उन्हें क़त्ल कर दिया और लोगों ने मेरी बैयत कर ली इस तरह के न उन पर कोई ज़बरदस्ती थी और न उन्हें मजबूर किया गया था बल्कि उन्होंने रग़बत व इख़्तेयार से ऐसा किया।
- फैज अहमद फैज की ये पंक्तियाँ दुहराने का माकूल वक्त है यह शायद- ‘‘ बोल कि लब आजाद हैं तेरे बोल जबाँ अब तक तेरी है तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख के आहंगर की दुकाँ में तुन्द हैं शोले सुर्ख है आहन खुलने लगे कुफलों के दहाने फैला हर इक जंजीर का दामन बोल ये थोड़ा वक्त बहुत है जिस्म-ओ-जबाँ की मौत से पहले बोल कि सच जिन्दा है अब तक बोल जो कुछ कहने हैं कह ले। ”
- जिसे चाहा नहीं था वह मुक़द्दर बन गया अपना कहाँ बुन्याद रखी थी कहाँ घर बन गया अपना लिपट कर तुन्द मौजौं से बड़ी आसूदगी पायी ज़रा साहिल से क्या निकले समुन्दर बन गया अपना कोई मंज़र हमारी आँख को अब नम नहीं करता होए क्या हादसे जो दिल ही पत्थर बन गया अपना हिजूम-ऐ-शेहर में देखा तो हम ही हम नज़र आए बनाया नक़्श जब उसका तो पैकर बन गया अपना चले थे एतेमाद आसाऐषों की आर्ज़ु लेकर ना जाने कौन्सा सेहरा मुक़द्दर बन गया अपना तुन्द =