पांख का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- बुरशी पांख से कुडि़याधार तक की सवारी सबसे अच्छी मानी जाती थी , क्योंकि उसके आगे चढ़ाई खत्म हो जाती थी और ट्रक की रफ्तार तेज हो जाने से हमारे लिए हाथ छोड़ कर सड़क पर सुरक्षित उतरना मुश्किल हो जाता था।
- बादलों को धो पोंछ कर साफ कर दिया झक् बगुले की पांख सा लगने लगा बादल तभी सूरज बोल पडा अरे उनको ड्राई क्लिनिंग करना पडता है इतना भी नहीं जानते कहीं तुम कवि तो नहीं ऐसा काम वे ही करते हैं।
- कितने दिन छूटेंगे , जैसे मन से रगड़ खाकर आंखों का सूखा लोर छूटता है कितने दिन उड़ेंगे जैसे गाल छुआकर चिरई मनोहारी अपनी पांख मन की आंख खोलती है कितने दिन होगा कि नीले पीले कत्थई धानी सुर्ख़ लाल के बीच गुज़रत ...
- सुख क्या है . .. सुख क्या है ?बतला सकते हो ? पंडुक की सुकुमार पांख या लाल चौंच मैना की ? चरवाहे की बंसी का स्वर ? याकि गूँज उस निर्झर की जिसके दोनों तट हरे ,सुगन्धित देवदारुओं से सेवित हैं ? सुख कोई सुकुमार हाथ हैं ?
- दरियो आगे . ..आयनो अश्विनी भट्ट पृष्ठ 170 मूल्य $ 10.95आयनो आगे...प्रकृतिथी परमात्मा किशोर देसाई पृष्ठ 100 मूल्य $ 10.95प्रकृतिथी परमात्मा आगे...सरगोस गुणवंतराय आचार्य पृष्ठ 244 मूल्य $ 11.95सरगोस आगे...अंजाम मोहम्मद मांकड पृष्ठ 300 मूल्य $ 9.95अंजाम आगे...आतम वींझे पांख ए. पी. जे. अब्दुल कलाम पृष्ठ 249 मूल्य $ 12.95आतम वींझे पांख आगे...
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- प्यास हूँ मै जिंदगी की प्यास हूँ , धूप का जलता हुआ अहसास हूँ , चाहता था मै गगन चूमूं कभी , पुष्प की इक पांख सा झूमूं अभी , पर चुभन से गीत मेरे रह गए , कूल सा ठहरा रहा मै ,धार से तुम बह गए , जान कर सबकुछ बुरा लगता नहीं , कोई सपना प्यार का जगता नहीं ,
- प्यास हूँ मै जिंदगी की प्यास हूँ , धूप का जलता हुआ अहसास हूँ , चाहता था मै गगन चूमूं कभी , पुष्प की इक पांख सा झूमूं अभी , पर चुभन से गीत मेरे रह गए , कूल सा ठहरा रहा मै ,धार से तुम बह गए , जान कर सबकुछ बुरा लगता नहीं , कोई सपना प्यार का जगता नहीं ,...
- है उस मेरी पीड़ा का आभास जो घोली गई बचपन से मेरे कानों से अधिक चेतना में अंतस् तल भेदी विस् फोट सी कि परायी हूं मैं मात्र औपचारिकता भर मानवी होकर भी पल् लवित की गई मेरी देह ․․․ केवल देह और कभी न पूरा गया प्रेम की तूलिका से भावों के कोरे केनवास को और पांख लगे मन में सहेजे स् वप् नों को।
- कितने दिन छूटेंगे , जैसे मन से रगड़ खाकर आंखों का सूखा लोर छूटता है कितने दिन उड़ेंगे जैसे गाल छुआकर चिरई मनोहारी अपनी पांख मन की आंख खोलती है कितने दिन होगा कि नीले पीले कत्थई धानी सुर्ख़ लाल के बीच गुज़रती, रंग बहलती सारी सियाह लकीरों को तुम ठीक-ठीक पहचान लोगी, अपनी नाओं को रिसायकल बिन में धरकर अपनी हांओं का सजीला डेस्कटाप कर लोगी.