फ़र्शी का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में , सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे”।
- फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में , सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे”।
- फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में , सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके , अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “ इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे ” ।
- ( (( इस इरशादे गिरामी से साफ़ वाज़ेह होता है के इस्लाम हर तहज़ीब को गवारा नहीं करता है और इसके बारे में यह देखना चाहता है के इसकी अफ़ादियत क्या है और आखि़रत में इसका नुक़सान किस क़द्र है , हमारी मुल्की तहज़ीब में फ़र्शी सलाम करना , ग़ैरे ख़ुदा के सामने बहद्दे रूकूअ झुकना भी है जो इस्लाम में क़तअन जाएज़ नहीं है , किसी ज़रूरत से झुकना और है और ताज़ीम के ख़याल से झुकना और है , सलाम ताज़ीम के लिये होता है , लेहाज़ा इसमें रूकूअ की हुदूद तक जाना सही नहीं है )))