बृहदारण्यक उपनिषद् का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- वाणी का महत्व : बृहदारण्यक उपनिषद् में राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं- जब सूर्य अस्त हो जाता है , चंद्रमा की चांदनी भी नहीं रहती और आग भी बुझ जाती है , उस समय मनुष्य को प्रकाश देने वाली कौन-सी वस्तु है ?
- वाणी का महत्व : बृहदारण्यक उपनिषद् में राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं- जब सूर्य अस्त हो जाता है , चंद्रमा की चांदनी भी नहीं रहती और आग भी बुझ जाती है , उस समय मनुष्य को प्रकाश देने वाली कौन-सी वस्तु है ?
- बृहदारण्यक उपनिषद् के चतुर्थ अध्याय के पाँचवें ब्राह्मण के 11 वें मंत्र में याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी के संवाद के सिलसिले में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा है कि ' यथाद्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चिरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य नि : श्वसितमेतदृग्वेदो यजुर्वेद : सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहास : पुराणं विद्या उपनिषद : श्लोका : सूत्राण्यनुव्याख्यानिव्याख्यानीष्टं हुतमाशितं पायितमयं च लोक :
- ( वृहदारण्यक उपनिषद ६ / ४ / १ , २ ) लेकिन ऐसा भी नहीं है कि रति कि्रया केवल सन्तान प्राप्ति के जरिये के रूप में ही मान्य , क्योंकि उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में आया है कि यदि पति पत्नी किसी कारणवश गर्भधान नहीं करना चाहते है ता उसके लिए यौन कर्म करते समय इस मंत्र का जाप करें ' इन्द्रेयेण ते रेतसा रेत आददे ( बृहदारण्यक उपनिषद् ) ‘ ऐसा करने पर पत्नी गर्भवती नहीं होती है।