वह्रि का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- शिवशक्त्यात्मकं ज्ञेयं श्रीचक्रं शिवयोर्वपु : ॥ के अनुसार पांच शक्ति - त्रिकोण , अष्टार , अन्तर्दशार , बहिर्दशार , और चतुर्दशार ये पांच अधोमुख त्रिकोण शक्तिचक्र है , चार वह्रि ( शिव ) -बिन्दु अष्टदल षोडशादल भूपुर या चतुरस्त्र ये चार ऊर्ध्वमुख त्रिकोण वह्रि ( शिव ) चक्र है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- इसी सन्निकर्ष की महिमा से किसी एक मात्र धूम में किसी एक मात्र वह्रि के साहचर्य ज्ञान से ही सब धूमों में सब वह्रि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है तथा सन्निकृष्ट धूम में वह्रि की व्याप्ति का निश्चय रहते हुए भी असन्निकृष्ट धूम में वह्रिव्यभिचार का संदेह होता है।
- शुद्धसाध्य व्यापक उपाधि - जब वह्रि से धूम का अनुमान किया जाता है , तब “आद्र्र र्इंधन” उ गीली लकड़ी शुद्ध साध्य का व्यापक उपाधि होता है, क्योंकि आद्र्रं र्इंधन धूम रूप साध्य के सभी आश्रयों में रहता है पर अग्नितप्त लोहगोलक में न रहने के कारण वह्रि रूप साधन के सब आश्रयों में नहीं रहता।
- शुद्धसाध्य व्यापक उपाधि - जब वह्रि से धूम का अनुमान किया जाता है , तब “आद्र्र र्इंधन” उ गीली लकड़ी शुद्ध साध्य का व्यापक उपाधि होता है, क्योंकि आद्र्रं र्इंधन धूम रूप साध्य के सभी आश्रयों में रहता है पर अग्नितप्त लोहगोलक में न रहने के कारण वह्रि रूप साधन के सब आश्रयों में नहीं रहता।
- शुद्धसाध्य व्यापक उपाधि - जब वह्रि से धूम का अनुमान किया जाता है , तब “आद्र्र र्इंधन” उ गीली लकड़ी शुद्ध साध्य का व्यापक उपाधि होता है, क्योंकि आद्र्रं र्इंधन धूम रूप साध्य के सभी आश्रयों में रहता है पर अग्नितप्त लोहगोलक में न रहने के कारण वह्रि रूप साधन के सब आश्रयों में नहीं रहता।