विराट् पुरुष का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- गीता में अर्जुन को जिस प्रकार भगवान् ने अपना विराट् रूप दिखाया है , वैसे ही विराट् पुरुष के दर्शन अपने कल्पनालोक में मानस चक्षुओं से करने चाहिए।
- ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में विराट् पुरुष की कल्पना है . जब उसे विभाजितकिया गया तो उसके मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, उरु (जाँघ) से वैश्यतथा पद से शूद्र निकले.
- २ ६ . ७ ० ( चैत्य क्षेत्रज्ञ पुरुष द्वारा चित्त के माध्यम से हृदय में प्रवेश करने पर ही विराट् पुरुष के उत्थान का कथन ) , ४ .
- ( इस विराट् पुरुष के मुंह से ब्राह्मण , बाहु से राजस्व ( क्षत्रिय ) , ऊरु ( जंघा ) से वैश्य और पद ( चरण ) से शूद्र उत्पन्न हुआ। )
- यह शक्ति बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति स्वयं को विराट् पुरुष का एक अंग , राष्ट्रीय मशीन का एक प्रामाणिक पुर्जा मानकर चले , सबके संयुक्त हित पर आस्था रखे , यह आवश्यक है।
- फिर उस विराट् पुरुष ने तप करके इस जगत की सृष्टि करने वाले मुझको उत्पन्न किया और फिर मैंने प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा से कठिन तप करके पहले दश प्रजापति महर्षियों को उत्पन्न किया।
- ईश्वर को दयालु , प्रेमी मानने के बाद व्यक्ति उस विराट् पुरुष का ही एक अंग बन जाता है एवं एक प्रकार से उनके कर्म को तत्त्व से जानकर शांति की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है।
- भगवान् की झाँकी तीन रूप में की जा सकती है- ( १ ) विराट् पुरुष के रूप में ( २ ) राम , कृष्ण , विष्णु , गायत्री , सरस्वती आदि के रूप में ( ३ ) दीपक की ज्योति के रूप में।
- सर्वलोक महेश्वर को अर्पण चूँकि परमात्मा ही सभी प्रकार के यज्ञों एवं तपों के भोक्ता हैं , इसलिए मुक्ति की कामना रखने वाले सभी साधकों को अपने सभी कर्मों को यज्ञ व तप रूप में करते हुए विराट् पुरुष उस महेश्वर को उनके फल को अर्पित कर देना चाहिए।
- ईश्वर ने ब्रह्माण्ड बनाया और वे सब देवता आकर उसमें सिथत हो गए , तब भी ब्रह्माण्ड में चेतना नहीं आयी और वह विराट् पुरुष उठा नहीं , किन्तु जब चित्त के देवता क्षेत्राज्ञ ने चित्त के सहित हृदय में प्रवेश किया तो विराट् पुरुष तुरन्तर उठकर खड़ा हो गया।