अकारांत का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- सरित में रि , भगवन् में न्, धनुष में नु आदि. ए. दो ऐसे निकटवर्ती लघु वर्ण जिनका स्वतंत्र उच्चारण अनिवार्य न हो और बाद के अकारांत लघु वर्ण का उच्चारण हलंत वर्ण के रूप में हो सकता हो तो दोनों वर्ण मिलाकर संयुक्त माने जा सकते हैं।
- # संस् कृत में भाषा के कितने ही कमाल हैं , पहले पहल रामरक्षास् तोत्र के '' रामो राजमणिः सदा विजयते ... '' से अकारांत पुल्लिंग कारक रचना का एकवचन याद करने का आइडिया जोरदार लगा था , उसी तरह एक अन् य प्रयोग जिसमें सवाल ही जवाब हैं-
- कर्ता कारक में ' हि ' की विभक्ति गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो केवल सकर्मक भूतकालिक क्रिया के सर्वनाम कर्ता में ही लगाई है ( जैसे , तेइ सब लोक लोकपति जीते ) पर जायसी में अकारांत संज्ञा कर्ता में भी यह चिह्न प्राय : मिलता है , जैसे -
- सरित में रि , भगवन् में न् , धनुष में नु आदि . ए. दो ऐसे निकटवर्ती लघु वर्ण जिनका स्वतंत्र उच्चारण अनिवार्य न हो और बाद के अकारांत लघु वर्ण का उच्चारण हलंत वर्ण के रूप में हो सकता हो तो दोनों वर्ण मिलाकर संयुक्त माने जा सकते हैं .
- जो शब्द केवल अकारांत इकारांत के अनुसार ही पुल्लिंग अथवा स्त्रीलिंग हो गये हैं , और जिनमें लिंग का अर्थ के साथ सामंजस्य नहीं मिलता , उन शब्दों का ठीक-ठीक चित्र ही आँखों के सामने नहीं उतरता , और कविता में उनका प्रयोग करते समय कल्पना कुंठित सी हो जाती है।
- इसे संक्षेप में समझने के लिये महाराष्ट्र प्रदेश के नामों जैसे गोखले , खेर, परांजपे, पाध्ये, मुंजे गोडवोले, तांबे, तथा लंका में प्रचलित नामों जैसे गुणतिलके सेना नायके, बंदरनायक आदि में जो अकारांत कर्ता एक वचन के रूप से ए प्रत्यय दिखाई देता है, वही पूर्व की मागधी प्राकृत मे अपने नियमित स्थिरता को प्राप्त हुआ पाया जाता है।
- इसे संक्षेप में समझने के लिये महाराष्ट्र प्रदेश के नामों जैसे गोखले , खेर, परांजपे, पाध्ये, मुंजे गोडवोले, तांबे, तथा लंका में प्रचलित नामों जैसे गुणतिलके सेना नायके, बंदरनायक आदि में जो अकारांत कर्ता एक वचन के रूप से ए प्रत्यय दिखाई देता है, वही पूर्व की मागधी प्राकृत मे अपने नियमित स्थिरता को प्राप्त हुआ पाया जाता है।
- इनमें पैशाची का विशेषता शब्द के मध्य में तृतीय चतुर्थ वर्णो के स्थान पर प्रथम तथा द्वितीय का आदेश , ण के स्थान पर न्, ज्ञ्, न्य के स्थान पर ञ्ञ तथा त्वा के स्थान पर तूण बतलाई गई है, और मागधी की ष्, स्, के स्थान पर क्ष ज् के स्थान पर य्, क्ष के स्थान पर एक अहं के स्थान पर हके, हगे व अहके, तथा अकारांत कर्ता कारक एकवचन के अंत में ए कही गई हैं।
- इनमें पैशाची का विशेषता शब्द के मध्य में तृतीय चतुर्थ वर्णो के स्थान पर प्रथम तथा द्वितीय का आदेश , ण के स्थान पर न्, ज्ञ्, न्य के स्थान पर ञ्ञ तथा त्वा के स्थान पर तूण बतलाई गई है, और मागधी की ष्, स्, के स्थान पर क्ष ज् के स्थान पर य्, क्ष के स्थान पर एक अहं के स्थान पर हके, हगे व अहके, तथा अकारांत कर्ता कारक एकवचन के अंत में ए कही गई हैं।
- संज्ञाओं का वितरण इस प्रकार से पाया जाता है - अकारांत संज्ञाएँ सदा स्त्रीलिंग होती है , जैसे खट (खाट), तार, जिभ (जीभ), बाँह, सूँह (शोभा); ओकरांत संज्ञाएँ सहा पुल्लिंग होती हैं, जैसे घोड़ों, कुतो, महिनो (महीना), हफ्तो, दूँहों (धूम); -आ-, इ और - ई में अंत होने वाली संज्ञाएँ बहुधा स्त्रीलिंग हैं, जैसे हवा, गरोला (खोज), मखि राति, दिलि (दिल), दरी (खिड़की), (घोड़ो, बिल्ली-अपवाद रूप से सेठी (सेठ), मिसिरि (मिसर), पखी, हाथी, साँइ और संस्कृत के शब्द राजा, दाता पुल्लिंग हैं;