अरुणाई का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- झीनी सी कोहरे की चादर सुबह-शिशु को गरमास ओढाये है शिशु के कपोलों की लाली छिपती नहीं है कम्बल में अरुणाई की मादकता सुमन-सौरभ के भार से लदी छलकी जाती है जग में और जग की निष्ठुर क्रीडा चल रही है अनवरत . ..................
- पत्रकार एवं लेखक डा . वीरेन्द्र आज़म के अनुसार कमलनाथ प्रकृति और प्रेम के चितेरे चित्रकार हैं जिनकी पेंटिंग इठलाती भी दिखती है और खिलखिलाती भी ! उनकी पेंटिंग में श्रृंगार भी है, तरुणाई भी, सांझ की लालिमा भी है और अरुणाई भी !
- जागो भारत की तरुणाई , प्रश्नों की आँधी , कविता तेरह ताल की , रक्त बोध , हस्ताक्षर इत्यादि आपकी प्रतिनिधि गेय गीति रचनाएँ हैं - - श्रम की गंगा घर-घर आई धरती पर बिखरी अरुणाई युग सृजन करो संकल्प यही जागो भारत की तरुणाई ।
- “रागानुगा” से- मैं दिखा , लजा गई अरुणाई ऐसी कुछ चमक सद्य: धुले चेहरे पर आई जैसे मन्दिर के ओस-भीगे कलश से सो के जगी ऊषा की, पहली-पहली किरण टकराई॥ “रागापरा” से- मत किनारे आओ भंवर में रस लो उसमें चक्कर जरूर है पर गति वहीं है।
- या कोई रूपसी उन्मना बैठी जाग रही है प्रणय-सेज पर , क्षितिज-पास, विद्रुम की अरुणाई में सिर की ओर चन्द्रमय मंगल-निद्राकलश सजा कर श्रुतिपट पर उत्तप्त श्वास का स्पर्श और अधरों पर, रसना की गुदगुदी, अदीपित निश के अन्धियाले में रस-माती, भटकती ऊंगलियों का संचरण त्वचा पर;
- एक ही चित्र में रंग जब भर दिये , तूलिका ने ढली सांझ अरुणाई के कालनिशि के तिमिर में नहाई हुई भाद्रपद की अमावस की अँगड़ाई के फूल की गंध के प्रीत के छन्द के, तो लगा आपका चित्र वह बन गया बोलने लग गये रंग सरगम बने ढल गये गूँज में एक शहनाई के
- एक ही चित्र में रंग जब भर दिये , तूलिका ने ढली सांझ अरुणाई के कालनिशि के तिमिर में नहाई हुई भाद्रपद की अमावस की अँगड़ाई के फूल की गंध के प्रीत के छन्द के , तो लगा आपका चित्र वह बन गया बोलने लग गये रंग सरगम बने ढल गये गूँज में एक शहनाई के
- आप हैं ज्योत्सना , वर्त्तिका आप हैं , मैं तले दीप के एक परछाईं हूँ घिर रहे थाप के अनवरत शोर में रह गई मौन जो एक शहनाई हूँ आप पारस हैं , बस आपके स्पर्श ने एक पत्थर छुआ और प्रतिमा बनी आपके स्नेह की गंध की छाँह में जो सुवासित हुई , मैं वो अरुणाई हूँ .
- अरुणिमा की बात जो बात अक्सर रही अनकही , वह कहने का प्रयास तब मैं अपनी तन्हाई को ढलती सांझ क्षितिज पर आकर जब बिखेरती अरुणाई को नज़्म सुना बहला लेती हूँ, तब मैं अपनी तन्हाई को ्सावन का आवारा बादल मेरी ज़ुल्फ़ें देखे, सोचे आईने में देख रहा है, वो अपनी ही परछाई को लांघ गये पग उसके जब से दहलीजों की लक्ष्मण रेखा देखा करती सुबकी लेते मैं इक [...]
- जो विसंगतियाँ बिखेरीं ज़िन्दगी ने पंथ में आ मैं उन्हें अरुणाई कर के भोर की जीता रहा हूँ दोपहर ने जो पिघल कर सांझ के प्याले भरे हैं पीर के वे पल निरंतर ओक भर पीता रहा हूँ रात के बिखरे चिकुर में गंध ले निशिगंध वाली गूँथता मंदाकिनी की लहर के मोती उठाकर स्वप्न की दहलीज पर जो आ उतर जाते अचानक याद के पैबन्द अपने मौन से सीता रहा हूँ