आराइश का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- और फिर वो मज़लूम और मासूम जनता जब अपने ही वतन में अपने हुक्मरानों का वह तल्ख़ रवैया देखती है जिसमें वे लोग आसमान की उस बुलंदी पर बैठे हैं और उनको दुनिया की हर आराम व आराइश मुहैया है बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा , और उनको ज़मीन पर रहने वालों से कोई सरोकार नहीं है.
- * शायरी में ज़ुबान का इस्तेमाल और लफ़्जों क े चुनाव के बारे में कुछ बताइए ? - देखि ए , शायरी के अल्फ़ाज़ हैं आराइश के समान जैसे बिंदिय ा , लिपिस्टि क , कंघ ा , परफ्यू म , पावडर वगैर ा जो किस ी नौजवान खूबसूरत दोशीजा के ड्रेसिंग टेबल पर सजे रहते हैं।
- और आराइश और तुम्हारी आपस में बड़ाई मारना और माल और औलाद में एक दूसरे पर ज़ियादती चाहना ( 2 ) ( 2 ) और उन चीज़ों में मश्ग़ूल रहना और उनसे दिल लगाना दुनिया है , लेकिन ताअतें और इबादतें और जो चीज़ें कि ताअत पर सहायक हों और वो आख़िरत के कामें में से हैं .
- और अहले जुर्म से उनके गुनाहों का सवाल न करना पड़ेगा ( ? ) फिर वह अपनी आराइश से अपनी बिरादरी के सामने निकला जो लोग दुया के तालिब थे , कहने लगे क्या खूब होता कि हमको भी वह साज़ो सामान मिला होता जैसा कि कारून को मिला है , वाकई वह वह बड़ा साहिबे नसीब है .
- आँख खोल कर देखा जा सकता है , सऊदी अरब मुहम्मद की अरब क़ौम कि आराम से ऐशो आराइश में गुज़र कर रही है और प्राचीन बुद्धिष्ट अफगानी दुन्या तालिबानी बनी हुई है, सिंध और पंजाब के हिन्दू अल्कएदी बन चुके हैं, हिदुस्तान के बीस करोड़ इन्सान मुफ़्त में साहिबे ईमान बने फिर रहे है, दे दो पचास पचास हज़ार रुपया तो ईमान घोल कर पी जाएँ.
- आँख खोल कर देखा जा सकता है , सऊदी अरब मुहम्मद की अरब क़ौम कि आराम से ऐशो आराइश में गुज़र कर रही है और प्राचीन बुद्धिष्ट अफगानी दुन्या तालिबानी बनी हुई है , सिंध और पंजाब के हिन्दू अल्कएदी बन चुके हैं , हिदुस्तान के बीस करोड़ इन्सान मुफ़्त में साहिबे ईमान बने फिर रहे है , दे दो पचास पचास हज़ार रुपया तो ईमान घोल कर पी जाएँ . सब के सब गुमराह।
- कुछ मुश्किल शब्दों के अर्थ : 1) बाव-ए-करम - दया का विषय 2) वा - प्रारम्भ 3) शब-ए-तारीक़ - अंधेरी रात 4) आराइश - साज-सज्जा 5) पैकर- ज़िस्म 6) बुतशिकन - मूर्तियाँ तोड़ने वाले 7) शेवा - आदत होली के रंग होली के पर्व की यह विशेषता है कि यह हर व्यक्ति को अपने में समेट लेता है और उसे कुछ समय के लिये दुनिया के हर ग़म और चिंता से दूर एक आनंद-लोक में खींच ले जाता है.
- पैग़म्मबरे अकरम ( स) हमेशा ज़मीन पर बैठ कर खाना खाया करते थे, अपने हाथ से अपनी जूतियां टाकते थे, और अपने दस्ते मुबारक से अपने कपड़ो को पेवन्द लगाया करते थे, बग़ैर चार जामा की सवारी पर सवार होते थे और किसी न किसी को अपने साथ बिठा भी लिया करते थे, एक मरतबा अपने घर के दरवाज़े पर ऍसा परदा देखा जिस पर तस्वीर बनी हुई थीं तो एक ज़ौजा से फ़रमाया ख़बरदार ईसे हटाओ, मैं इस की तरफ़ देखूंगा तो दुनिया और उसकी आराइश याद आएगी।
- ख़ुदा की क़सम ! जब तक मुसलमानों के उमूर का नज़्मों नसक़ ( शान्ति एंव व्यवस्था ) बरक़रार ( स्थापित ) रहेगा और सिर्फ़ मेरी ही ज़ात ( व्यक्तित्व ) ज़ुल्मों जौर ( अत्याचारों ) का निशाना ( लक्ष्य ) बनती रहेगी मैं ख़ामोशी ( मौन ) इख़्तियार ( धारण ) करता रहूंगा ताकि इस सब्र ( धैर्य ) पर अल्लाह से अज्रो सवाब ( पुण्य व पुरस्कार ) तलब करूं और इस ज़ेबो ज़ीनत ( साज सज्जा ) और आराइश ( सजावट ) ठुकरा दूं जिस पर तुम मिटे हुए हो।