ईदैन का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- हदीस में है कि जिसने ईदैन की रात यानी शबे ईदुल फित्र और शबे ईदुल अज्हा तलबे सवाब के लिए कियाम किया , उस दिन उस का दिल नहीं मरेगा , जिस दिन लोगों के दिल मर जायेंगे।
- फिक़्ह ( इसलामी शास्त्र) और उसके सिद्धांत » फिक़्ह (धर्म-शास्त्र) और उसके सिद्धांत » उपासना के अधिनियम » नमाज़ » विभिन्न अवसरों की नमाज़ें » ईदैन की नमाज़. - फिक़्ह (इसलामी शास्त्र) और उसके सिद्धांत » फिक़्ह (धर्म-शास्त्र) और
- तथा तिर्मिज़ी ने कसीर बिन अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन औफ अन अबीह अन जद्दिहि की हदीस से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईदैन में पहली रक्अत में क़िराअत से पहले सात तक्बीरें और दूसरी रकअत में क़िराअत से पहले पाँच तक्बीरें कहीं।
- तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सभी खुत्बों का आरंभ अल्लाह की हम्द व सना ( स्तुति ) से करते थे , और आप के बारे में किसी एक हदीस में भी यह बात सुरक्षित नहीं है कि आप ईदैन के खुत्बों का आरंभ तक्बीर से करते थे।
- बल्कि इब्ने माजा ने अपनी सुनन ( हदीस संख्या : 1287 ) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मुअज़्ज़िन सअद अल-क़रज़ से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : “ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खुत्बा के बीच तक्बीर कहते थे , आप ईदैन के खुत्बा में अधिक तक्बीर कहते थे।
- 64 - सुबह ( फज्र ) की नमाज़ , तथा जुमुआ , ईदैन ( ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा ) और सलातुल इस्तिस्क़ा ( बारिश मांगने की नमाज़ ) , कुसूफ ( सूर्य या चाँद ग्रहण ) की नमाज़ और इसी प्रकार मग़रिब और इशा की पहली दो रकअतों में किराअत बुलन्द आवाज़ से करेंगे।
- 64 - सुबह ( फज्र ) की नमाज़ , तथा जुमुआ , ईदैन ( ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा ) और सलातुल इस्तिस्क़ा ( बारिश मांगने की नमाज़ ) , कुसूफ ( सूर्य या चाँद ग्रहण ) की नमाज़ और इसी प्रकार मग़रिब और इशा की पहली दो रकअतों में किराअत बुलन्द आवाज़ से करेंगे।
- और यदि इसका अभिप्राय ईद के दो दिनों ( ईदैन ) और तश्रीक़ के दिनों के अलावा अगले साल तक रोज़े को बराबर जारी रखना है , तो इसे विद्वानों के निकट सौमुद्दह्र ( ज़माने भर का रोज़ा ) कहा जाता है , और इसका हुक्म यह है कि वह विद्वानों के सहीह कथन के अनुसार मक्रूह ( अनेच्छिक ) है।
- ईमान वाले तो वही है जो अल्लाह और उसके रसूल पर यक़ीन लाए और जब रसूल के पास किसी ऐसे काम में हाज़िर हुए हों जिसके लिये जमा किये गए हों , ( 1 ) ( 1 ) जैसे कि जिहाद और जंग की तदबीर और शुक्रवार व ईदैन और हर मशवरा और हर इज्तिमा , जो अल्लाह के लिये हो .
- उनके ऊपर अनिवार्य है कि वे लोगों के साथ रोज़ा रखें , लोगों के साथ रोज़ा रखना बंद करें और अपने देश में मुसलमानों के साथ ईदैन की नमाज़ पढ़ें , क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “ चाँद देखकर रोज़ा रखो और चाँद देखकर रोज़ा रखना बंद करो , यदि तुम्हारे ऊपर बदली हो जाये तो अवधि पूरी करो।