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पवित्री का अर्थ

पवित्री अंग्रेज़ी में मतलब

उदाहरण वाक्य

  1. - इसके बाद प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें , फिर पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर देवी को अर्पित करें तथा मंत्रों से संकल्प लें।
  2. तर्पण प्रारंभ करने से पूर्व दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण की जाये , पवित्री कुशाओं में गांठ लगाकर इस प्रकार छल्ले (अंगूठी) की तरह बनाई जाती है,जिसमेंकुषाओं के दोनों सिरे मूल एवं अग्र भाग अलग अलग निकलें हुए रहें ,
  3. तर्पण प्रारंभ करने से पूर्व दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण की जाये , पवित्री कुशाओं में गांठ लगाकर इस प्रकार छल्ले (अंगूठी) की तरह बनाई जाती है,जिसमेंकुषाओं के दोनों सिरे मूल एवं अग्र भाग अलग अलग निकलें हुए रहें ,
  4. तर्पण प्रारंभ करने से पूर्व दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण की जाये , पवित्री कुशाओं में गांठ लगाकर इस प्रकार छल्ले (अंगूठी) की तरह बनाई जाती है,जिसमेंकुषाओं के दोनों सिरे मूल एवं अग्र भाग अलग अलग निकलें हुए रहें ,
  5. आलोचना तो पवित्री ( बोल्ड लेटर में) है जिसके बिना कोई भी साहित्य-भोज न तो आरंभ हो सकता है, न पूर्ण, न पवित्र।'' लेखन में मात्रा और ध्यान की महत्ता बताने वाले अरुण कमल की ध्वनियों का संसार बाजारपरक और खाऊ किस्म का लगता है।
  6. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा ॥ तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें , फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-
  7. पवित्री धारण करने के पश्चात एक बड़े पात्र में जल-चांवल-जौ-तिल-दूध-सफ़ेद पुष्प रखें और सामने एक बड़ी थाली ( परात ) रखें,जो श्रद्धालु यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) धारण नहीं करते उन्हें तर्पण करते समय जनेऊ धारण जरुर करना चाहिए,अब छ: चरणों में तर्पण प्रक्रिया का प्रारंभ करे
  8. `पारचून ' में वे लिखते हैं “यदि ईश्वर है तो यह पूरी पृथ्वी उसके लिए पारचून की एक दुकान ही तो है, कविता भी ऐसी ही अच्छी लगती है, ढेर-ढेर चीज़ें, बेइंतहा, सृष्टि की एक अद्भुत नुमाइश-पारचून की दुकान।'' कुल लब्बो-लुआब यह कि आलोचना अगर पवित्री (परसादी) है तो कविता पारचून की दुकान।
  9. याम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें , फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें- चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है।
  10. तदनुसार शवयात्रा की तैयारी कर लिए जाने पर प्रमुख संस्कारकर्ता अपनी मध्यमा अंगुली में कुशा की “ पवित्री ' धारण कर यव , जल , पुष्प आदि के साथ संकल्पपूर्वक जौ / चावल के आटे के पाँच पिण्ड तैयार करता है , जिन्हें उनके पृथक्- पृथक् नामों से निम्नलिखित रुपों में मृतक को अर्पित किया जाता है।
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