पैंजनी का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- घुँघरुओं से बिछुड़ पैंजनी रह गई मौन की रागिनी झनझनाती रही - अव्यवस्थित सपन की सुई हाथ ले करते तुरपाई हम थे रहे रात भर चीथड़ों में फ़टे वस्त्र सा पर दिवस हमको देता अंधेरा रहा कात कर ज़िन्दगी थी सिरा तकलियों का रही पूनियां दूर होती गईं वक्त की सेमली फ़ाहे ओढ़े हुए थे निमिष असलियत पत्थरों सी मगर सख्त थी
- चित्रकारी करे , कैनवस कर धरा रख नियंत्रण चले वक्त की चाल पर सॄष्टि का पूर्ण आधार बन कर रहे लिख कहानी अमिट काल के भाल पर मिल मलय में चढ़े शीश पर ईश के और प्रक्षाल दे पाहुने पांव को पनघटॊं की खनकती बने पैंजनी उग रही भोर में, ढल रही शाम को kya baat hai bhai ji sahaj anand se paripoorn saarthak geet. BADHAI
- डबडबा उठी हैं सपनों की आँखें विधवा-सी पैंजनी / करधनी / चूड़ियों की मन्नतें मुँह लुकाए कहीं अंधेरे में बैठा है त्यौहार वाला दिन बाँझ की तरह ससुराल से मायके की पैडगरि के बीच लापता है गाड़ी वाले का गीत घंटियों कि ठुन-ठुन चित्त पड़ा है किसान छिन्न-भिन्न मन इधर बहुत दिन हुए दादी की कोठी में नहीं महकता दुबराज वाला खेत उदासी में डूबा हुआ है गाँव
- डबडबा उठी हैं सपनों की आँखें विधवा-सी पैंजनी / करधनी / चूड़ियों की मन्नतें मुँह लुकाए कहीं अंधेरे में बैठा है त्यौहार वाला दिन बाँझ की तरह ससुराल से मायके की पैडगरि के बीच लापता है गाड़ी वाले का गीत घंटियों कि ठुन-ठुन चित्त पड़ा है किसान छिन्न-भिन्न मन इधर बहुत दिन हुए दादी की कोठी में नहीं महकता दुबराज वाला खेत उदासी में डूबा हुआ है गाँव ।।
- भोले-भाले बहुत कबूतर मैंने पाले बहुत कबूतर ढंग ढंग के बहुत कबूतर रंग रंग के बहुत कबूतर कुछ उजले कुछ लाल कबूतर चलते छम छम चाल कबूतर कुछ नीले बैंजनी कबूतर पहने हैं पैंजनी कबूतर करते मुझको प्यार कबूतर करते बड़ा दुलार कबूतर आ उंगली पर झूम कबूतर लेते हैं मुंह चूम कबूतर रखते रेशम बाल कबूतर चलते रुनझुन चाल कबूतर गुटर गुटर गूँ बोल कबूतर देते मिश्री घोल कबूतर।
- बीत गए है बहुत बरस अब भैया बूढ़े होने आए भाभी की पैंजनी का स्वर चुप गुमसुम है अपना आँगन घर राख हुई हैं आज चिता में जल नसीहतें बाबू जी की डूब गए हैं श्मशान में माँ की ममता के तुतले स्वर अब भी शायद ढूँढ सकें हम उस मसान के सूनेपन में “ बबुआ ” जैसे मीठे स्वर को खोए हुए अपने उस घर को आओ लौट चलें हम घर को
- ओ शल्य ! हयों को तेज करो , ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहां , गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों चुनकर सारे वीर जहां . ” ” हो शास्त्रों का झन-झन-निनाद , दन्तावल हों चिंग्घार रहे , रण को कराल घोषित करके हों समरशूर हुङकार रहे , कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड , उठता होर आर्त्तनाद क्षण-क्षण , झनझना रही हों तलवारें ; उडते हों तिग्म विशिख सन-सन . ” ” संहार देह धर खड़ा जहां अपनी पैंजनी बजाता हो , भीषण गर्जन में जहां रोर ताण्डव का डूबा जाता हो .