मूकता का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- शान्ति के मूल में शान्त शब्द है और शान्त के मूल में है संस्कृत की शम् धातु जिसमें शान्त , चुप्प , मौन , स्थैर्य , जीत , अन्त , मूकता , आराम , निवृत्ति जैसे भाव अभिप्राय हैं ।
- शान्ति के मूल में शान्त शब्द है और शान्त के मूल में है संस्कृत की शम् धातु जिसमें शान्त , चुप्प , मौन , स्थैर्य , जीत , अन्त , मूकता , आराम , निवृत्ति जैसे भाव अभिप्राय हैं ।
- जहां तुम थे अब भी वहां हो इस मौन में अजब धूमधाम है - हां यह पहले नहीं थी : इस मूकता में एक अजब बहार-सी है तुम्हारे युगयुगीन विद्रोही तराने की -जो अभी सेपहले इतनी आबोताब लिए हुए नहीं था !
- चौपाल में आमने सामने हम खड़े हैं पहले भी कई बार मिले हैं मूकता की महफ़िलों में आस-पास बैठे हैं बनकर दोनों अजनबी ! और मैं चाहती हूँ मैं अनजान ही रहूँ तुम्हारे लिए , और , तुम भी मेरे लिए शायद ……
- आज मूक दसों के चुने हुए प्रतीं की सारे आम बोली लग रही है , आय समर्थन देने की लिए खरदो और समरतन ना देने के लिए भी ख़रीदो, म दास, मू ओोटेर, मो जनता तमाशा बा शिद्दत की शांति औ मूकता से देख रह और झेल भी रही.
- अगर इस मूकता को वाणी न मिली तो लोक फिर से बेगार करेगा , जानवरों की तरह काम के बदले आधा पेट भोजन या आधा शरीर ढकने को कपड़ा मिल गया तो बहुत है वरना हमारे लोक प्रतिनिधि देश बचाओ अभियान चला कर स्वयं को बचाने में लगे हुए हैं।
- अगर इस मूकता को वाणी न मिली तो लोक फिर से बेगार करेगा , जानवरों की तरह काम के बदले आधा पेट भोजन या आधा शरीर ढकने को कपड़ा मिल गया तो बहुत है वरना हमारे लोक प्रतिनिधि देश बचाओ अभियान चला कर स्वयं को बचाने में लगे हुए हैं।
- अशक्ति ( असामर्थ्य ) , आपत्तियाँ , खाने-पीने आदि की तृष्णा , मूकता , ( बोल न सकना ) , मूढ़बुद्धिता ( जान न सकना ) , क्रीडा , कौतुक आदि के विषय में अभिलाषा करना , न मिलने पर दीन-हीन बन जाना और चंचलता - ये सब बाल्यावस्था में ही होते हैं।।
- अशक्ति ( असामर्थ्य ) , आपत्तियाँ , खाने-पीने आदि की तृष्णा , मूकता , ( बोल न सकना ) , मूढ़बुद्धिता ( जान न सकना ) , क्रीडा , कौतुक आदि के विषय में अभिलाषा करना , न मिलने पर दीन-हीन बन जाना और चंचलता - ये सब बाल्यावस्था में ही होते हैं।।
- क्षुब्ध और अस्त-व्यस्त ज्ञान को समेटने का संघर्ष करते हुए मन-ही-मन मैं बोला , “कितने अजीब व्यक्ति हैं ये और कितना कठिन है इनके वास्तविकता को पाना ! किन्तु मुझेसावधानी के साथ, धीरे-धीरे और संतोष रखकर तबतक चोट करनी होगी, जबतक इनकी मूकता बातचीत में न बदल जाय और इनके विचित्रता समझ में न आ जाय!”