रथारूढ़ का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- हरोजी के अनुनय-विनय और निशानी के रूप में जसनाथजी की माला देने पर सती काळलदे के साथ प्यारलदे और उनका अपाहिज भाई बोयतजी रथारूढ़ होकर कतरियासर के लिए रवाना हो गए।
- हरोजी के अनुनय-विनय और निशानी के रूप में जसनाथजी की माला देने पर सती काळलदे के साथ ' ' ' प्यारलदे '' ' और उनका अपाहिज भाई बोयतजी रथारूढ़ होकर कतरियासर के लिए रवाना हो गए।
- कठोपनिषद् में उल्लेख है कि यमराज नचिकेता को रथारूढ़ और संगीत वाद्य लिए हुए अनेक नारियां देने का प्रस्ताव रखता है और यह भी कहता है कि ये नारियां अन्य मनुष्यों को प्राप्त नहीं हो सकतीं।
- विगत दशहरे में एक सुसज्जित घोड़े पर सवार मगारची नगाड़े बजा बजा कर यह संकेत देता चलता था कि पुजारी समेत देवी दन्तेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ होने या उतारने में कितना समय और शेष है।
- गुंबद तालू में श्रीकृष्ण के संग राधा तथा रुक्मिणी , श्रीराम , शिव-पार्वती , शेषशायी विष्णु , मां भगवती , गणपति , वराह , रथारूढ़ श्री राम तथा रथवाहक बने बजरंगी हनुमान भव्य रूप में चित्रित हैं।
- गुंबद तालू में श्रीकृष्ण के संग राधा तथा रुक्मिणी , श्रीराम , शिव-पार्वती , शेषशायी विष्णु , मां भगवती , गणपति , वराह , रथारूढ़ श्री राम तथा रथवाहक बने बजरंगी हनुमान भव्य रूप में चित्रित हैं।
- श्री राम अयोध्या के राजप्रसाद से निकल कर सुमंत के साथ रथारूढ़ होकर श्रृंगवरपुर आये और वहाँ से तमसा और गंगा पार कर तीरथराज प्रयाग के दर्शन किये और भारद्वाज मुनि के आश्रम में उन्होंने विश्राम किया।
- शक्तिशाली रावण का वध और सौरज धीरज जेहि रथ चाका-सत्यशील दृढ़ ध्वजा पताका , के विजय रथ पर रथारूढ़ श्रीराम की विजय से यही संकेत और निर्देश प्रतीक रूप में देती विजयादशमी मात्र धूमधाम और लोक उत्सव को ही नहीं अपितु आत्मबल और प्रेरणा के साथ सदवृत्तियों के शक्ति संचयन का भी आवाहन करती आई है।
- हालाँकि सत्ता के लिए जब ये गंगा जमुनी मार्ग जमीन पर नहीं बन सका तो रथारूढ़ होकर , हाथ में त्रिशूल लेकर हिन्दू जनता के सामने राम लला के नाम पर छाती कूटकर जल्द बाज़ी में ' दोउ गंवाँ बैठे ... माया ... मिली न राम .... इसी तरह अल्पसंख्यकों की उदारवादी कतारों को परे हटाते हुए इस्लामिक कट्टरपंथी भी बिना आगा पीछा सोचे भारत राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक स्वरूप को विच्छेदित करने में लगे हैं .
- अंतस में दबी चिंगारी खुद की पहचान ना कर पाने की विडंबना ह्रदय रसातल में दबे भावपुन्ज घटाटोप अँधेरे की चादर बिखरा -बिखरा अस्तित्व चेतनाशून्य मस्तिष्क अवचेतन मन की चेतना को खोजता सूक्ष्म शरीर कहो , कब , कैसे पार पायेगा मानव ! तू कैसे खुद को जान पायेगा भावनाओं के सागर पर रथारूढ़ हो प्रकाशपुंज तक पहुंचा नही जाता ' मैं ' को भुलाकर ही अस्तित्व को समेटा जाता है सब कुछ भुलाकर ही खुद को पाया जाता है