लकुटी का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- हे श्याम ! तेरी लकुटी कमरिया कहाँ गयो हेरायोदशा देख तू ग्वालबाल की जल में दूध मेरायोजल में दूध मेरायो समय ये कैसो आयोदूध दही ते छाडी दे, पनीर भी अशुद्ध बनायोकर ये बुरे काम गर्व से खुद को ग्वाल कहायोकहे रत्नेश हे श्याम ये वंश का बेडा पर लगायोबेडा पर लगायो
- हे श्याम ! तेरी लकुटी कमरिया कहाँ गयो हेरायोदशा देख तू ग्वालबाल की जल में दूध मेरायोजल में दूध मेरायो समय ये कैसो आयोदूध दही ते छाडी दे, पनीर भी अशुद्ध बनायोकर ये बुरे काम गर्व से खुद को ग्वाल कहायोकहे रत्नेश हे श्याम ये वंश का बेडा पर लगायोबेडा पर लगायो...
- बारहों महीने चाहे कड़ाके की ठंड हो या लू चलती हो , मैदान में हो या हिमालय की ऊँचार्इयों पर, आप बदन पर मात्र खादी की एक धोती व चादर, सादा चप्पल व गुरुदेव से प्राप्त दिव्य लकुटी (लाठी) धारण किए हुए आज भी लोगों को धर्म की ओर उन्मुख करा रहे हैं।
- बारहों महीने चाहे कड़ाके की ठंड हो या लू चलती हो , मैदान में हों या हिमालय की ऊंचाइयों पर आप बदन पर मात्र खादी की एक धोती व चादर, सादा चप्पल व गुरुदेव से प्राप्त दिव्य लकुटी (लाठी) धारण किए हुए, आज भी लोगों को धर्म की ओर उन्मुख कर रहे हैं।
- तब दिनभर उनकी बाट जोही जाती थी , अब दिन-रात उनकी बाट जोही जाएगी , श्रीकृष्ण आ रहे हैं , गउओं की खुरों से रौंदी जाती धरती के धूलिकणों से उनकी लटें सनी हुई , श्रम की बूंदें ललाट पर झलकती हुई , हुमकती हुई गाएं आगे और पीछे-पीछे एक हाथ में वंशी , एक हाथ में लकुटी लिए श्रीकृष्ण आ रहे होंगे , हमारी आंखों के उत्सव आ रहे होंगे।
- इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वे कृष्ण की लकुटी और कामरी पर तीनों लोकों का राज्य त्यागने को तैयार हैं , [[ नंद ]] की गायों को चराने में वे आठों सिद्धियों और नवों निधियों के सुख को भुला सकते हैं , [[ ब्रज ]] के वनों एवं उपवनों पर सोने के करोड़ों महल निछावर करने को प्रस्तुत हैं- poem > वा लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहू पुर को ताजि डारौं।
- इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वे कृष्ण की लकुटी और कामरी पर तीनों लोकों का राज्य त्यागने को तैयार हैं , [[ नंद ]] की गायों को चराने में वे आठों सिद्धियों और नवों निधियों के सुख को भुला सकते हैं , [[ ब्रज ]] के वनों एवं उपवनों पर सोने के करोड़ों महल निछावर करने को प्रस्तुत हैं- poem > वा लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहू पुर को ताजि डारौं।
- तीज-त्योहार की मस्ती किसने चुरा ली ; दही बिलोने वाली के थिरकन पर अब किसी किसन कन्हैया का मन क्यों नहीं नाचता ? सूरज की पहली किरण अब ग्वाले के हाथ लकुटी क्यों नहीं बनती ? उगता सूरज , अब किसी हल जोतने वाले के मन में अपनी प्रिया के भाल पर लगे कुमकुम की याद क्यों नहीं जगाता ? रात का चाँद अब किसी नववधू की देह मेम अपने प्रियतम की याद का ताबीज़ बनकर क्यों नहीं चुभता?
- ओह मेरे प्यारे श्याम रे , शोभा तेरी पे लुटे तेरे प्यारे, श्याम रे वंशी ने तेरी दिल लिया छीना मोर मुकुट पे जाए बलिहार रे तेरे कजरारे नैनों ने किया जादू लूट के ले गए यह नयना हिये हमार रे अंगवस्त्र में मन जाए अटक प्यारी लागे तेरी बनमाल रे पट पीट पीताम्बर, लकुटी कमरिया शोभा कही ना जाए इसकी,करें यह कमाल रे पग में छम छम नुपुर बाजे,तेरे प्यारो का हिये संग संग नाचे संग में फिजायें दे रही ताल रे ओह मेरे प्यारे श्याम रे
- के पदभीगी हुई आँखों का ये मन्ज़र न मिलेगाभूइयां के गीतमातृभाषा प्रेम पर दोहेया लकुटी अरु कामरियाये ऐश-ओ-तरब के मतवाले बेकार की बातें करते हैंरक़ीब सेरसखान के दोहेरहीम के दोहेलड्डू ले लोवसंतवहाँ कौन है तेरा , मुसाफ़िर, जाएगा कहाँशक्ति और क्षमाशाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करोशासन की बंदूकश्री रामचँद्र कृपालु भजु मनसत्यसपनासर फ़रोशी की तमन्नासरसिज बिनु सर सरसैसव जौवन दुहु मिल गेलसोचा नहीं अछा बुरा देखा सुना कुछ भी नहींस्तुति-खंडहनुमान चालीसाहमने तो रगड़ा हैहर ज़ोर-जुल्म की टक्कर मेंहस्ती अपनी होबाब की सी हैहास्याष्टकहे भले आदमियो !हे मातृभूमिहिन्दी गद्य साहित्यप्रेमचन्दकहानियांत्रिया-चरित्रमनावनमिलाप