लुच्ची का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- वि . : ( क्रोध से ) हत तेरी की , दाई माई कुटनी लुच्ची मूर्ख ! अब हम ऐसे हो गए कि मजदूरिनैं भी हमैं हंसै ! वि च. :
- मैं-अन्नू तो बहुत लुच्ची औरत है हमेशा लुच्ची-२ बातें करती वो तो आसानी से तैयार हो जायेगी मुश्किल तो मुझे होगी अगर आपकी इजाजत हो तो क्या मैं भी सारा दिन नाइटी पहनना शुरू कर दूं
- मैं-अन्नू तो बहुत लुच्ची औरत है हमेशा लुच्ची-२ बातें करती वो तो आसानी से तैयार हो जायेगी मुश्किल तो मुझे होगी अगर आपकी इजाजत हो तो क्या मैं भी सारा दिन नाइटी पहनना शुरू कर दूं . ................
- सारे नहीं , लेकिन कई दर्जन लोग तो उस हॉल के अंदर बाकायदा हर फ्यूडल संवाद , मनोज वाजपेयी की हर लुच्ची नज़र और कलात्मक ambiguity के उस understated टेक्सचर पर सीटियाँ बजा रहे थे और फब्तियां कस रहे थे .
- ग्राहको की पूरी तृप्ति . .. यह मेरा शिलालेख है. हालांकि कमाटीपूराकी लगभग सभी वैश्याएं लुच्ची, ढोंगी और मक्कार होती है! कुछ तो ग्राहको कोठगने से भी नही हिचकती! किसी अनुभवहीन ग्राहक को वे पल भर में 'खलास' करउसकी जेंबें झाड़ लेती हैं! रात का लगभग एक हुआ होगा! गंगूबाई से मिलने का यही समय था.
- यो तेरी लुगाई मरी लुच्ची राण्ड बिया होने देवे ही क्या लल्ली का ? कुण्डली बदलने से कमसकम उसका बिया तो हो गया - वरना जिन्दगी भर करती इसी की गुलाम्मी | यो तो चावे ही यो ही | पर में पूच्छूँ हूँ अक तू कब लौं इसका गुलाम बना रेवेगा भाई ? ”
- चलो ना भटके लफ़ंगे कूचों में लुच्ची गलियों के चौक देखें सुना है वो लोग चूस कर जिन को वक़्त ने रास्तें में फेंका थ सब यहीं आके बस गये हैं ये छिलके हैं ज़िन्दगी के इन का अर्क निकालो कि ज़हर इन का तुम्हरे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और जितने वो मार देगा चलो ना भटके लफ़ंगे कूचों में
- चलो ना भटके लफ़ंगे कूचों में लुच्ची गलियों के चौक देखें सुना है वो लोग चूस कर जिन को वक़्त ने रास्तें में फेंका थ सब यहीं आके बस गये हैं ये छिलके हैं ज़िन्दगी के इन का अर्क निकालो कि ज़हर इन का तुम्हरे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और जितने वो मार देगा चलो ना भटके लफ़ंगे कूचों में
- आने दे गंगा कू , सारी बात बताऊँगी आज | वो तो भला हो मैं आ गई इंगे वरना यो तो छेत गेरती लल्ली कू | अरी लुच्ची राण्ड , अरे मरी कीड़े पड़ें तेरे … ठीकरे फूटें तुझपे … अरी ऐसे पढ़ावें हैं क्या बच्चों कू … ? हाय हाय देक्खो तो क्या शकल बना दी है लल्ली की … ? आ री मेरे पास आ … ” कहते हुए बुआ सरोज को अपनी तरफ़ खींचने लगीं |
- दूसरी ओर नएपन के चक्कर से उगे औरत की आजादी - बराबरी वाले खयाल भी उपजाता है कि “ हम एक आधुनिक समाज हैं ” ! समाज का ये अर्जित संतोष , ये ग्लानि भाव से मुक्ति केवल ऎसे ही तो संभव थी मेरी सखी ! हमारी ये छवि हमारी भी कितनी बडी सहायिका है ऎसे ही तो हम आश् वस्ति हासिल करती हैं कि “ नहीं हम लुच्ची नहीं हैं , आजादी के मानकों का ईमानदारी से इस्तेमाल कर रहीं हैं ....