सतवंती का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- फिर भी कुछ कहानियों के नाम बताता हूँ- बापू , कान्ही , कुंडली , सतवंती , रुकमणी , गढ़ी , अर्जन छेड़ गडीरना , कोठी वाली , कपाल-क्रिया , जड़ हरी , सुर्खुरू , नावल का मुढ़ , इस जन्म में , फैसला , बेवतन , सींह ते अमनतास , तपीआ , टाकी , कीड़े दा रिज़क , मुरब्बियाँ वाली आदि-आदि।
- फिर भी कुछ कहानियों के नाम बताता हूँ- बापू , कान्ही , कुंडली , सतवंती , रुकमणी , गढ़ी , अर्जन छेड़ गडीरना , कोठी वाली , कपाल-क्रिया , जड़ हरी , सुर्खुरू , नावल का मुढ़ , इस जन्म में , फैसला , बेवतन , सींह ते अमनतास , तपीआ , टाकी , कीड़े दा रिज़क , मुरब्बियाँ वाली आदि-आदि।
- तू उपले और घास लेकर बाज़ार जाती , वहाँ से रुपए लाती और तेरा बाप बैठा , उसी रुपए की ताड़ी पीता , फिर क्यों उस ब्राह्मण का अपमान कराया ? क्यों उसकी आबरू में बट्टा लगाया ? क्यों सतवंती बनी बैठी हो ? जब अकेले नहीं रहा जाता , तो किसी से सगाई क्यों नहीं कर लेती ; क्यों नदी-तालाब में डूब नहीं मरती ? क्यों दूसरों के जीवन में विष घोलती है ?
- सतवंती या पतिव्रता की उन्होंने जरूर प्रशंसा की , किन्तु ‘ नारी नदी अथाह जल , बूड़ि मुआ संसार ' , ‘ नागिन के तो दोय फन , नारी के फन बीस ' , ‘ नारी की झाईं परत अंधा होत भुजंग ' , ‘ नारी बड़ा विकार ' आदि कहकर उन्होंने नारी - जाति की घनघोर निंदा की है और ‘ चली कुलबोरनी गंगा नहाय ' -जैसी व्यंगोक्ति से उसका उपहास किया है .
- इतनी शान्ति और तन्मयता , चित्त को विभोर कर देनेवाली रस की यह सहज वर्षा वहाँ कहाँ ? एक नये गीत की तान उठ रही है - अकेल सिया रोवे ! हो राम जी , बोलें जिनावर , कोई लोग ना लुगाई , घोर बन माँ डिरावै ! हो राम जी ! गरुआ गरभ , लाय भुइयाँ में डारी , हिया पल ना थिरावे , हो राम जी कैस दुख झेले सतवंती मेहरिया , टेर केहि का बुलावे , हो राम जी ! कैस बियाबान अहै , हो राम जी !