सांख्यदर्शन का अर्थ
उदाहरण वाक्य
- किन्तु उसका दिव्यात्मा रूप भारतीय संस्कृतिमें अनेक रूपों में स्थिति रखता है-- भारतमाता के रूप में , राष्ट्रीयता में, प्रकृति के रूप में सांख्यदर्शन में, माया के रूप में, वेदान्त दर्शन में, शक्ति के रूप में, तन्त्र साधना में, राधा-सीता के रूप में, सगुणोपासना में, ब्रह्म की अंशभूत प्रेयसी आत्माय के रूप में निर्गुण साधना में, अतः उसेभारतीय संस्कृति के विकासक्रम से भिन्न करके देखना असम्भव है.
- ' महत : षाड्विशेषा : सृज्यन्ते तन्मात्राण्यहंकारश्चेति विंध्यवासिमतम् ' पंचाधिकरण इन्द्रियों को भौतिक मानते हैं- ' भौतिकानीन्द्रियाणीति पंचाधिकरणमतम् ' ( 22 वीं कारिका पर युक्तिदीपिका ) संभवत : वार्षगण्य ही ऐसे सांख्याचार्य हैं जो मानते हैं कि प्रधानप्रवृत्तिरप्रत्ययापुरुषेणाऽपरिगृह्यमाणाऽदिसर्गे वर्तन्ते * ' साथ ही वार्षगण्य के मत में एकादशकरण मान्य है जबकि प्राय : सांख्य परम्परा त्रयोदशकरण को मानती है युक्तिदीपिका के उक्त उल्लेखों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय तक सांख्यदर्शन में अनेक मत प्रचलित हो चुके थे।