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सोह का अर्थ

सोह अंग्रेज़ी में मतलब

उदाहरण वाक्य

  1. सत नमो आदेश | गुरूजी को आदेश | ॐ गुरूजी | ॐ सोह सिद्ध की काया , तीसरा नेत्र त्रिकुट ठहराया | गगण मण्डल में अनहद बाजा | वहा देखा शिवजी बैठा, गुरु हुकम से भीतरी
  2. सिंदूर सोह मुसे की सवारी अनधन को आंख देत कोडिन को काया बझान को पुर्त्र देत निर्धन को माया पान चड फूल चड और चड मेवा सुर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा जय गणेश देवा
  3. मधे सिंदूर सोह मुसे की सवारी अनधन को आंख देत कोडिन को काया बझान को पुर्त्र देत निर्धन को माया पान चड फूल चड और चड मेवा सुर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा जय गणेश देवा
  4. सोह न बसन बीमा वर नारी ( रामचरित मानस , बालकाण्ड ) इसके अर्थबोध में किंचित भी दुरूहता आए तो खाकसार को याद कीजियेगा , फौरन हाजिर होगा ! आपकी सिक्किम यात्रा मनोरम प्रसंगों से गुजर रही है और एक यात्रा मैंने शुरू की थी उसके राम ही मालिक हैं खैर ...
  5. री धूप छनी , छन कर गिरी, तीखी अब तक हुई नहीं सोह सोह , सोह के सोखी पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई, छू गई और अंतर मे समाई कभी तो लगी भली कभी तनिक न सुहाई मेरे मन मे प्रिय के संग सी प्रिय के बिना भला क्यूँ आई छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई
  6. री धूप छनी , छन कर गिरी, तीखी अब तक हुई नहीं सोह सोह , सोह के सोखी पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई, छू गई और अंतर मे समाई कभी तो लगी भली कभी तनिक न सुहाई मेरे मन मे प्रिय के संग सी प्रिय के बिना भला क्यूँ आई छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई
  7. री धूप छनी , छन कर गिरी, तीखी अब तक हुई नहीं सोह सोह , सोह के सोखी पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई, छू गई और अंतर मे समाई कभी तो लगी भली कभी तनिक न सुहाई मेरे मन मे प्रिय के संग सी प्रिय के बिना भला क्यूँ आई छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई
  8. री धूप छनी , छन कर गिरी, तीखी अब तक हुई नहीं सोह सोह , सोह के सोखी पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई, छू गई और अंतर मे समाई कभी तो लगी भली कभी तनिक न सुहाई मेरे मन मे प्रिय के संग सी प्रिय के बिना भला क्यूँ आई छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई
  9. तुलसीदास भी कह गए हैं - ' ' वसन हीन नहीं सोह सुरारी , सब भूषण भूषण बर नारी . '' मानव शरीर नग्न यदि सुन्दर लगा करता तो सभ्यता के विकास के साथ मानव वस्त्र कभी भी धारण नहीं करता और यदि पढ़े लिखे होने का मतलब शरीर से वस्त्र कम करना या सोच को नग्न करना है तो ये ही कहना होगा कि - '' ऐसी पढ़ी लिखी से तो लड़कियां अनपढ़ ही अच्छी . '' शालिनी कौशिक [ कौशल ]
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