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राबिया बसरी वाक्य

उच्चारण: [ raabiyaa besri ]

उदाहरण वाक्य

  1. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं-इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...
  2. सूफी हसन बसरी और राबिया बसरी तबेईन में आला मुकाम हस्तियाँ हुई हैं इनकी मकबूलियत का यह आलम था कि इनके सामने इस्लाम को पसीने आ गए थे.
  3. राबिया बसरी ने जब यह सुना तो जवाब में कहा ” जो कभी बंद ही नहीं हुआ, तो उसके खुलने, न खुलने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है।
  4. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं-इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हु आ...
  5. हज़रत राबिया बसरी फ़रमाती हैं-इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हु आ...
  6. पर आज भी अपने आस पास नज़र घुमाता हूँ तो पाता हूँ कि जन्नत केवल मर्दों के लिए ही है।...................... बहरहाल मुझे ' राबिया बसरी ' से ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है जो मज़हब से बग़ावत करता है।
  7. मेरे अल्फाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख्यालात की तर्जुमानी करते हैं...क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...फ़िरदौस ख़ान इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ.......हज़रत राबिया बसरी
  8. मेरे अल्फाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख्यालात की तर्जुमानी करते हैं...क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...फ़िरदौस ख़ानइश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ.......हज़रत राबिया बसरी हिन्दुस्तान का शहज़ादा
  9. हसन बसरी और राबिया बसरी मुहम्मद के बाद तबा ताबेईन हुए, जो बागी ए पैगंबरी थे और मुहम्मदुर रसूल अल्लाह कभी नहीं कहा.हसन बसरी का वक़ेआ मशहूर है कि एक हाथ में आग और दूसरे हाथ में पानी ले कर भागे जा रहे थे, लोगों ने पूंछा कहाँ? बोले जा रहा हूँ उस दोज़ख को पानी से ठंडी करने जिसके डर से लोग नमाज़ पढ़ते हैं और उस जन्नत को आग लगाने जिस की लालच में लोग नमाज़ पढ़ते हैं.
  10. मुहम्मद कालीन मशहूर सूफ़ी ओवैस करनी जिसके तसव्वुफ़ के कद्रदान मुहम्मद भी थे, जिसको कि मुहम्मद ने बाद मौत के अपना पैराहन पहुँचाने की वसीअत की थी, मुहम्मद से दूर जंगलों में छिपता रहता कि इस ज़ालिम से मुलाक़ात होगी तो कुफ्र '' मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह '' मुँह पर लाना पड़ेगा. इस्लामी वक्तों के माइल स्टोन हसन बसरी और राबिया बसरी इस्लामी हाकिमों से छुपे छुपे फिरते थे कि यह '' मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह '' को कुफ्र मानते थे. मक्के के आस पास फ़तेह मक्का के बाद इस्लामी गुंडों का राज हो गया था.
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