आर्य अष्टांगिक मार्ग वाक्य
उच्चारण: [ aarey asetaanegaik maarega ]
उदाहरण वाक्य
- ५) हिन्दुधर्म के सत्यनारायण कथा के तर्ज पर “ परित्राण पाठ ” कथा का प्रचार करना. ६) बहुजनो, सभी दुखियों को सुख का आर्य अष्टांगिक मार्ग का उदबोधन करने के लिए बजाए, मठाधीश होना, लोगों को अपनी ओर बुलाना.
- तो क्या हरेक ने अपने-अपने विचारों को ही सही समझना चाहिए? मेरे नजर से बुद्ध के मध्यम, “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” को पर्याय देने के, पलीद करने के दृष्टी से ‘ महायानी ' भिक्षुओ ने उसे पाली साहित्य में ऊपर से चिपकाया है.
- लोगों को बौद्ध बनाना तो ठीक ही है, त्रिशरण, पंचशील को पालान करने या २२ प्रतिज्ञाओं का पालन करने के लिए नही तो “ आर्थिक जनतंत्र ” को धम्म द्वारा बहाली कर सुख-शांति बहाल करने के लिए “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” के मध्यम मार्ग पर.
- पद्मासन पर बैठे बुद्ध, पद्म यानि पाँव, पालथी मरकर बैठे बुद्ध, क्या केवल आसन से ज्ञान प्राप्त होता है? अगर ऐसा ही होता तो बुद्ध को “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” समझाने की क्या जरुरत थी? क्या कोई व्यक्ति कमल के फुल पर बैठ सकता है?
- तो कोई ख्रिश्चन बने. अगर पीड़ित जनता को “ जाती-वर्ग-वर्ण विहीन समाज निर्मिती ” में बौद्धों ने साथ नही दिया तो उनके “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” को कौन कहेगा की यह मार्ग “ बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय ” है तथा वह “ विश्व की पुनर्रचना ” करना चाहता है?
- जिनमे से कुछ प्रमुख विचारक थे, उसमे १) पूर्ण कश्यप, २) मख्खली गोसाल, ३) अजित केशकम्बल, ४) पकुध कात्यायन, ५) संजय वेल्त्तिपुत्र, ६) निगंठीनाथ पुत्र, ७) चार्वाक और ८) आलार कालम. तथागत बुद्ध ने इन सभी के मतों का खंडन करते हुए अपने नए विचारों को “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” के रूप में विषद किया.
- तथागत बुद्ध ने सुरु से अन्त तक “ आर्य अष्टांगिक मार्ग ” को ही सुखी जीवन का मार्ग बताया और उसे नजर अंदाज करके वे लोगों को यह कैसे क्या बता सकते है की ‘ तुम तुम्हारे तर्क, विवेक पर भी भरोसा करो, उसे ही मेरे विचार समझो? ' लोग तर्क खुद करेंगे तो वे उनके (बुद्ध के) विचार होंगे, उसे बुद्ध के विचार कैसे क्या माना जाना चाहिए? तर्क, विवेक या बुद्ध हरेक के अलग-अलग होते है.