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अमरजीत कौंके वाक्य

उच्चारण: [ amerjit kaunek ]

उदाहरण वाक्य

  1. मुझे उम्मीद है कि “सेतु साहित्य” के पाठक डा. अमरजीत कौंके की यहाँ प्रकाशित दस कविताओं को पढ़कर न केवल इनसे एक गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे बल्कि अपने भीतर इन कविताओं पर टिप्पणी छोड़ने का दबाव भी अनुभव करेंगे।
  2. मुझे उम्मीद है कि ' ' सेतु साहित्य '' के पाठक डा. अमरजीत कौंके की यहाँ प्रकाशित दस कविताओं को पढ़कर न केवल इनसे एक गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे बल्कि अपने भीतर इन कविताओं पर टिप्पणी छोड़ने का दबाव भी अनुभव करेंगे।
  3. मुठ्ठी भर रौशनी / अमरजीत कौंके सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ अभी शेष है अब भी मुठ्ठी भर रौशनी इस तमाम अँधेरे के खिलाफ खेतों में अभी भी लहलहाती हैं फसलें पृथ्वी की कोख तैयार है अब भी बीज को पौधा बनाने के लिए..
  4. 098142 31698 काश / अमरजीत कौंके मेरा प्यार तुम पर इस तरह बरसता है जैसे किसी पत्थर के ऊपर लगातार पानी का कोई झरना गिरता है............................... काश! तुम्हे कभी किसी बृक्ष की भांति बारिश में भीगने की कला आ जाये.........
  5. 098142 31698 युद्धरत्त / अमरजीत कौंके एक न एक दिन चीर दूंगा यह अँधेरे की चादर बस यही सोच कर मैं युद्धरत्त हूँ निरंतर इस अँधेरे के पार मुझे मेरी माँ का चेहरा नज़र आता है इस अँधेरे के पार मुझे मेरे पिता के झुक रहे काँधे दिखाई देते हैं.....
  6. कुछ शब्द / अमरजीत कौंके कुछ शब्द लिखे थे किसी और के लिए पढ़े किसी और ने समझा कोई और पढ़ कर भावुक कोई और हुआ प्रभावित कोई और गुस्से कोई और हुआ ख़ुशी हुई किसी और को कुछ शब्द जिस के लिए लिखे थे सिर्फ उसी ने नहीं पढ़े................
  7. अपनी माँ के निधन पर डा. अमरजीत कौंके ने कुछ कविताएँ पिछले बरस लिखी थीं जिन्हें उन्होंने अपनी त्रैमासिक पत्रिका '' प्रतिमान '' (जुलाई-सितम्बर 2008) में प्रकाशित किया था, उन्हीं में एक कविता '' माँ के नाम का चिराग '' भी यहाँ प्रस्तुत की जा रही है।
  8. रंजना जी, आपकी कहानी पड़ी...हैरान रह गया मैं....कहानी के अंत में आपने हैरान ही कर दिया...दूसरी बात सोचने वाली यह है कि जो बात हम सोच भी नहीं सकते ये लोग कितनी आसानी से कर देते हैं और इनके मन में इस बात का कोई मलाल नहीं....यह कहानी और भी कई सवाल उठाती है......जिन के जवाब इतने सहज नहीं...ये कहानी बेचैन करने वाली है........डॉ. अमरजीत कौंके
  9. नेम प्लेट / अमरजीत कौंके तमन्ना थी उसकी कि इक नेम प्लेट हो अपनी जिस पर लिखे हों हम दोनों के नाम मैंने कहा-नेम प्लेट के लिए एक दीवार चाहिए दीवार के लिए घर घर के लिए तुम और मैं तुम और मैं और बच्चे बच्चे.... बच्चे कह कर उसने नज़रें चुरा लीं और दूर आकाश में देखने लगी जैसे तलाश रही हो... घर बच्चे और नेम प्लेट...............
  10. राज़ / अमरजीत कौंके वह हंसती तो मोतिओं वाले घर का दरवाज़ा खुलता और खिलखिलाने लगती कायनात मैं हैरान हो कर पूछता उस से कि इस हंसी का राज़ किया है.....? उसके चेहरे पर पृथ्वी का संयम था उसके माथे पर आकाश की विशालता सूर्य का तेज़ था उसकी आँखों में अपने वालों को वो इन्द्र्ध्नुशय से यूँ बांधती कि कायनात खिल उठती समुंदर की तरह गहरी उसकी आँखों में कहीं कोई किश्ती नहीं थी ठहरती.....
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