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इन्द्रायण वाक्य

उच्चारण: [ inedraayen ]

उदाहरण वाक्य

  1. उपंदश (गर्मी का रोग या सिफिलिस)-कचनार की छाल, इन्द्रायण की जड़, बबूल की फली, छोटी कटेरी के जड़ व पत्ते और पुराना गुड़ 125 ग्राम।
  2. अगर आप पके बेल के गूदे को बकरी के दूध में पकाकर फिर उसमें १०-१० ग्राम मिश्री, मोचरस और इन्द्रायण की जड़ मिलाकर पीजिये तो खूनी दस्त से तुरंत मुक्ति मिल जायेगी.
  3. इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण 4 ग्राम की मात्रा में 125 ग्राम दूध में पीसकर छान लें तथा 10 ग्राम अरण्डी का तेल मिलाकर रोज़ पीयें इससे अंडवृद्धि रोग कुछ ही दिनों में दूर हो जाता है।
  4. * 1 ग्राम अजवाइन को इन्द्रायण के फलों में भरकर रख दें, जब वह सूख जाये तब उसे बारीक पीसकर इच्छानुसार काला नमक मिलाकर रख लें, इसे गर्म पानी से सेवन करने से लाभ मिलता हैं।
  5. हिन्दी में भावार्थ-अवस्था के परिपक्व हो जाने पर जिस मनुष्य में दुष्टता की प्रवृत्ति होती है उसमें फिर कभी बदलाव नहीं आता जैसे अत्यंत पक जाने पर इन्द्रायण के फल में मिठास नहीं आता बल्कि वह कड़वा ही बना रहता है।
  6. गैस, शरीर में सूजन, बुखार और दस्त के लिए पके बेल के गूदे को चिरायता, गिलोय, नागरमोथा, इन्द्रायण की जड़ और सुगंधबाला के साथ २ ०-२ ० ग्राम की मात्रा में लीजिये और एक लीटर पानी में पकाकर काढा बना लीजिये.
  7. पिछली पोस्ट में मैंने पथरी से बचने का तरीका सुझाया था अगर आपके शरीर में पथरी नहीं बनी है या आप एक बार पथरी का आपरेशन करा चुके हैं तो वह तरीका जरूर अपनाएं, किन्तु अगर शरीर में पथरी है तो उसकी दवा-एक ग्राम इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण और एक ग्राम मूसली का चूर्ण लीजिये.
  8. हो सके तो छाया मे सुखा ले, बाद मे मलमल का नुतन वस्त्र इन्द्रायण रस मे आर्द्र कर इस मे वत्रिका लपेट पीछे से धागे से लपेट कर भग मे रखें मजबूत धागा हो जो भग से १२ इंच बाहर हो ताकि उसे पकड कर खींचने मे आसानी हो, कम से कम ४-५ घंटे रखने के बाद निकाल कर उस वर्तिका को फ़ेंक दें पुन:
  9. * अजवाइन, हाऊबेर, त्रिफला, सोंफ, कालाजीरा, पीपरामूल, बनतुलसी, कचूर, सोया, बच, जीरा, त्रिकुटा, चोक, चीता, जवाखार, सज्जी, पोहकरमूल, कूठ, पांचों नमक और बायबिण्डग को 10-10 ग्राम की बराबर मात्रा में, दन्ती 30 ग्राम, निशोथ और इन्द्रायण 20-20 ग्राम और सातला 40 ग्राम को मिलाकर अच्छी तरह बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर बनाकर रख लें।
  10. हो सके तो छाया मे सुखा ले, बाद मे मलमल का नुतन वस्त्र इन्द्रायण रस मे आर्द्र कर इस मे वत्रिका लपेट पीछे से धागे से लपेट कर भग मे रखें मजबूत धागा हो जो भग से १ २ इंच बाहर हो ताकि उसे पकड कर खींचने मे आसानी हो, कम से कम ४-५ घंटे रखने के बाद निकाल कर उस वर्तिका को फ़ेंक दें पुन: ६-७ घंटा के बाद रखें ।
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