देवेन्द्र स्वरूप वाक्य
उच्चारण: [ devenedr sevrup ]
उदाहरण वाक्य
- मंथन में श्री देवेन्द्र स्वरूप ने अपने लेख ' राष्ट्रहित के सुझाव से डरा वंशवाद' में प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि वर्तमान संप्रग सरकार देशहित के मामलों में कतई गंभीर नहीं है।
- ” इसी प्रश्न को वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र स्वरूप ने ‘ जिन्ना एक पुनर्दृष्टि ' पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए इन शब्दों में उठाया था, ” देश में हिन्दू और मुसलमानों के दो नेता थे।
- इलके अलावा इस अंक में विवेकानंद पर लिखे-प्रेमचंद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, रोम्या रोलां, भगिनी निवेदिता से लेकर गिरिराज किशोर, देवेन्द्र स्वरूप, कृष्णदत्त पालीवाल, बी के कुठियाला, मृदुला सिन्हा तक के लेख संकलित किए गए हैं ।
- तिथि:-१८ फरवरी २००१»साहस और धैर्य ऐसे गुण हैं, जिनकी कठिन परिस्थितियों में भी बड़ी आवश्यकता होती है।»हिंसा का सामना करना होगा»संस्कार»-टी.वी.आर. शेनाय गुजरात भूकम्प»आख्यान»-देवेन्द्र स्वरूप इस बौद्धिकता से संवेदनशीलता भली»पाठकीय»कही-अनकही»पुस्तक-परिचय»पाञ्चजन्य»स्वस्थ मन के लिए योगासन»गहरे पानी पैठ»बाल जगत»अच्छे काम»-ज्योतिष महामहोपाध्याय सौ.
- देवेन्द्र स्वरूप, इतिहासका के मुताबिक “ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जो पक्षपात पूर्ण प्रतिपादन है ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और वामपंथी इतिहासकारों ने इसमें बहुत अनर्थ किया है उन्होंने पुराने पीढ़ी के इतिहासकार जैसे जैसे आर.सी.मजूमदार, के.एन. शास्त्री उन सबको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।”
- देवेन्द्र स्वरूप लिखित लेख में यह भी कहा गया था कि “ उन्होंने अपनी आत्मकथा का विभिन्न भाषाओं और देश के अनेक नगरों में जितनी धूमधाम के साथ लोकापर्ण कराया, उससे आभास होता है कि वे स्वयं को भारतीय राजनीति के नियति पुरुष के रूप में देखने लगे थे।
- इस संदर्भ में जाने-माने स्तंभकार देवेन्द्र स्वरूप कहते हैं, ‘यद्यपि भारतीय समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो कम समय और श्रम में अधिकाधिक धनोपार्जन कर रहे हैं लेकिन उसमें विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को प्रथम स्थान दिया जा सकता है फिर भी वे अपने वेतन के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं।
- इस संदर्भ में जाने-माने स्तंभकार देवेन्द्र स्वरूप कहते हैं, ‘ यद्यपि भारतीय समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो कम समय और श्रम में अधिकाधिक धनोपार्जन कर रहे हैं लेकिन उसमें विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को प्रथम स्थान दिया जा सकता है फिर भी वे अपने वेतन के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं।
- तिथि:-२९ जनवरी २०००»-देवेन्द्र स्वरूप दो दृश्य-एक संदेश»दीपावली-तीन चित्र»साक्षात्कार»जय होती है»बड़ी कठिन थी रोशनी»विदेशों में स्वयंसेवक»75वें वर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ»अस्त्रों से नहीं,»आकांक्षा»अथ»राष्ट्र का स्वाभिमान जाग्रत करें»संघ शक्ति-देव शक्ति»स्वयंसेवक रहा हूं, स्वयंसेवक हूं»15 अक्टूबर को शिविर के भारत सर्वाधिक शक्ति-सम्पन्न होगा!»आगरा में संघ के विराट स्वरूप का दर्शन»»»75 फुट ऊंचे ध्वजपोल पर जब ध्वज अटक गया तो वानर सेना के समान एक,दो,तीन,चार करते हुए एक स्वयंसेवक पोल पर चढ़ा, ध्वज ठीक किया और उतर आया।
- देवेन्द्र स्वरूप का इस संकलन में समाहित लेखों के प्रति अभिमत है-' इस संकलन का प्रत्येक लेख राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा के सामने खड़े खतरों एवं सामाजिक जीवन के नैतिक स्खलन के प्रति उनकी चिन्ता को ध्वनित करता है, उदात्त नैतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी के मन में आस्था जगाने के लिये परम्परा बोध का सहारा लेता है, इतिहास के प्रेरणादायी महापुरुषों एवं प्रसंगों का स्मरण दिलाता है, राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के सामने खड़ी समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण करता है।..........