रजनी कोठारी वाक्य
उच्चारण: [ rejni kothaari ]
उदाहरण वाक्य
- एक तरफ जहां रजनी कोठारी अल्पसंख्यकों को लोकतन्त्र की शक्ति मानते हैं वहीं यादव को लगता है कि अल्पसंख्यक राजनीति, प्रतिक्रियास्वरूप बहुसंख्यकवाद के मुहावरे को जन्म देती है।
- इसलिए हमने तसलीमा नसरीन, महाश्वेता देवी, रजनी कोठारी आदि बहुत से लोगों को कमिट किया है कि हम इंग्लिश में उसे प्रकाशित करेंगे और हिंदी में भी प्रकाशित करेंगे.
- दिल्ली की एक सहविकास सोसाइटी में एक फ्लैट के अलावा उनकी अपनी कोई संपत्ति नहीं थी और यह फ्लैट भी वह अपने मित्र रजनी कोठारी की मेहरबानी से हासिल कर सके थे.
- इंदिरा गांधी के त्यागपत्र की मांग हुई लेकिन त्यागपत्र देने के बजाय इंदिरा गांधी ने सिद्धार्थ शंकर रायए रजनी कोठारी और देवकांत बरुआ जैसे सलाहकारों के कहने पर आपातकाल की घोषणा कर दी।
- रजनी कोठारी, धीरूभाई सेठ, आशीष नंदी, रामाश्रय राय, वशीरूद्दीन अहमद, हर्ष सेठी, विजय प्रताप, योगेन्द्र यादव, शिव विश्वदनाथन, भीखू पारेख, अभय दुबे समेत जैसे दर्जनों नामचीनों ने मिलकर काम किया है ।
- अपनी किताब “ भारतीय राजनीति में जाति ” में समाजशास्त्री रजनी कोठारी तर्क देते हैं कि “ अपने लिए समर्थन जुटाने और अपनी स्थिति को मजबूत बानाने के लिए मौजूदा ढांचे को पहचानना और उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करना ही राजनैतिक प्रक्रिया होती है.
- इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर एसएआर गिलानी को भी झूठी साजिश में फंसाया गया था, जिसकी वजह से वे फांसी के फंदे से बाल-बाल बचे. अरुंधति राय, समाजशास्त्री रजनी कोठारी सहित प्रसिद्ध नागरिकों द्वारा मृत्युदंड का विरोध भी किया गया था.
- दीि विववािलय के रामजस कालेज में राजनीति शा के रीडर पद से सेवानिवा डा रामच धान समाजवादी आदोलन में सकिय रहे, रजनी कोठारी के मागदशन में लोकायन में अनेक वष काम किया, समाजवादी विचारधारा से आगे बढकर भगवदगीता का गहन अवगाहन कर ‘समवय योग' नामक गथ रचा।
- राजनीति विश्लेषक रजनी कोठारी अपनी पुस्तक “ भारत में राजनीति ” 9 में लिखते हैं कि पंचायत राज में बालिग मताधिकार, राजनैतिक दलों की स्पर्धा और आर्थिक योजनाओं तथा जनता की भलाई के कार्यों के चालू होने से जातियों के मुखियाओं का महत्व बढ गया है.
- वेल एस. हसन के पूर्वोद्धृत लेख के अलावा देखें: बेटी बर्गलैण्ड, ÷ ऑटोबायोग्राफी एंड अमेरिक कल्चर,' अमेरिकन क्वार्टरली, खंड ४५, अंक ३, सितम्बर, १९९३, पृष्ठ ४४५-४५८ ११. राजेन्द्र यादव, ÷ सदी का औपन्यासिक अंत', आदमी की निगाह में औरत, राजकमल, दिल्ली, २००६, पृष्ठ १६१-१८७ १२. यह थीसिस रजनी कोठारी की है।