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जय-विजय वाक्य

उच्चारण: [ jey-vijey ]

उदाहरण वाक्य

  1. यद्यपि वह बे-रोक-टोक भगवान विष्णु के पास जा सकते थे, परन्तु जय-विजय के रोकने के बाद कुमारों ने उनको श्राप दिया कि तुम्हें पृथ्वी लोक पर आसुरी योनि में तीन बार जन्म लेना होगा।
  2. ऐसी मान्यता है कि जिस दिन मूर्ति से हाथ का वह हिस्सा अलग हो जाएगा, उस दिन बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित जय-विजय पर्वत आपस में मिल जाएंगे और उसी क्षण बद्रीनाथ धाम का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा.
  3. दूसरा प्राचीर पार करते ही कई देवी-देवताओं-गणेश, काशी के विश्वनाथ, कागभुशुंडि, राम, लक्ष्मी, सर्वमंगला, काली, जय-विजय, सूर्य नारायण, राधा-कृष्ण, बुद्ध, पातालेश्वर, नृसिंह आदि की प्रतिमाएं हैं।
  4. हम सदा से इन ति-रंगों में सजाए चक्र हो निर्वैर लड़ते हैं अहिंसक, और सारे शोक, पीड़ा को हराते लौह-स्तंभों पर समर के गीत लिखते, जय-विजय के लेख खोदें, हम अ-शोकों के पुरोधा हैं।
  5. साधना चाह कोई कितनी भी ऊँची कर ले, भगवान राम, श्रीकृष्ण, शिव के साथ बातचीत कर ले, शिवलोक में शिवजी के गण या विष्णुलोक में जय-विजय की नाईं रहने को भी मिल जाय फिर भी साक्षात्कार के बिन यात्रा अधूरी रहती है।
  6. जय-विजय की कामना की प्रशंसा करते हुए सनकादि मुनियों ने विष्णु से कहा, ‘‘ भगवान, हमने यह रहस्य अभी जान लिया कि आप की दृष्टि में राग-द्वेष दोनों बराबर हैं और जो लोग आप से द्वेष करते हैं वे आपके और निकट हो जाते हैं।
  7. भौतिकता एवं पाशविकता के संयुक्त संक्रमण से व्यापक स्तर पर संवेदनहीनता की जो महामारी फैली है उसकी रोकथाम एवं उपचार करने के लिए प्रेम की जिस संजीवनी का प्रयोग करने की बात यह कवि करता है उससे इस कठिन समय में न केवल अन्य मानवीय सरोकारों से जुड़ाव होने की पूरी उम्मीद जागती है वरन इस समर में बसर करते हुए जय-विजय की आस भी बँधती है।
  8. -भारतीय काव्य शास्त्र परंपरा को समृद्ध किया ई. पू. १ ००० में महर्षि वेदव्यास रचित १ ८ पर्वों में १ लाख श्लोकों में रासबिहारी गोवर्धनधारी श्री कृष्ण की कालजयी कथा के बहाने सत-असत के संघर्ष की महागाथा कहने वाले महाकाव्य / महाभारत (पूर्व नाम जय-विजय, भारत) ने. इसे धर्मशास्त्र, स्मृति तथा कार्ष्ण वेद, पंचम वेद भी कहा गया.
  9. जब नारद जैसे ब्रह्मर्षि और सदा नारायण-रस में विचरण करने वाले भक्त शिरोमणि का अहंकार स्वयं प्रभु हरि समझाइश से दूर करने में स्वयं को असमर्थ पाकर लीला करने को विवश हो जाते हैं तो अपने गण जय-विजय या शिव के गण या अभिशप्त प्रतापभानु, जो मद मोहादि विकारों सेयुक्त होकर रावण रूप में जन्मा है, के इन सशक्त विकारों को एक-एक कर लीला करके ही निकालेंगे अन्यथा नहीं।
  10. जब नारद जैसे ब्रह्मर्षि और सदा नारायण-रस में विचरण करने वाले भक्त शिरोमणि का अहंकार स्वयं प्रभु हरि समझाइश से दूर करने में स्वयं को असमर्थ पाकर लीला करने को विवश हो जाते हैं तो अपने गण जय-विजय या शिव के गण या अभिशप्त प्रतापभानु, जो मद मोहादि विकारों सेयुक्त होकर रावण रूप में जन्मा है, के इन सशक्त विकारों को एक-एक कर लीला करके ही निकालेंगे अन्यथा नहीं।
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