विदेश-नीति वाक्य
उच्चारण: [ videsh-niti ]
उदाहरण वाक्य
- अब तो शेखी बघारना बंद कीजिये और चूडियाँ पहन कर अपने बंगले में जाकर खाता-बही संभालिए. ये राज-नीति, विदेश-नीति और कूट-नीति आपके क्या आपके अगल-बगल रहने वाले सभी नाकारा मंत्रियों के भी बस के बाहर की चीज है.
- ्मा-गांधी-राष्ट्रीय-ग्रामीण-रोजगार-गारंटी-योजना महाराष्ट्र महिला-दिवस मामा मामा-घोटाला मुंबई मुकेश-तिवारी मुस्लिम मैच-फिक्सिंग यौन-क्रिया राजनीति राजनीतिक-मुद्दे राजेश-तलवार रिश्वत रिश्वतखोरी रेड्डी-बंधु रेप रेल-घूसकांड रेल-मंत्री रेलगेट रोना लड़किया लड़के लद्दाख लोकेश वर्कशॉप्स विजय-सिंघला विज्ञापन विदेश-नीति विमिंस-डे विलेन वॉटरगेट व्यंग्य व्रत-त्योहार शीला-शर्मा शेट्टार शेर श्रीराम-सेना श्रीशांत
- इनमें से अनेक देशों ने न केवल अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता हासिल की है, बल्कि वे शांतिपूर्ण विदेश-नीति का अनुसरण कर रहे हैं, अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर रहे हैं और अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत कर रहे हैं।
- शीतयुद्ध के दौरान जापानी सरकार के विदेश-नीति के नक़्शे में भारत थोड़ा दूर हो गया था, जहाँ सत्थर के दशक में जापानी नागरिकों के लिए विदेश-यात्रा आज़ाद होने के बाद भारत ऐसी यात्रियों की बड़ी मंज़िल होने लगा.
- तो बरबस मुझे एक भूली-बिसरी कविता की पंक्तियाँ याद आने लगी, “ है युगों-युगों तक अमर कवि की वाणी!” सच में अटल की विदेश-नीति से भले कोई इत्तेफ़ाक़ न रखे पर “आओ मन की गांठे खोलें....” पर किसी को ऐतराज नहीं।
- संप्रग-२ सरकार की चौथी वर्षगाँठ मनाते हुए संप्रग सरकार ने पिछले चार साल की उपलब्धियों का जो रिपोर्ट कार्ड जारी किया है उसमे सरकार द्वारा अपनी पीठ थपथपाने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गयी है! विदेश-नीति से लेकर... Full Article
- हमने भारत सरकार की प्रगतिशील विदेश-नीति की हिफाजत के लिए एक मजबूत जन आन्दोलन नहीं खड़ा किया है, इसलिए हम उस नीति से भटकाव का मुकाबला करने के लिए आम जनता को बड़े पैमाने पर मैदान में उतारने में भी समर्थ नहीं हैं।
- लेकिन उनमें से किसी ने भी अपने निजी चुनावों के बारे में सोचने की जरूरत नहीं समझी (हंसते हुए) । यू. पी. ए. अवसरवादी गठबन्धनों जिन्होंने नाटकीय ढंग से आर्थिक और विदेश-नीति पर विरोधी विचार रखे हैं, का एक कैदी है।
- तो बरबस मुझे एक भूली-बिसरी कविता की पंक्तियाँ याद आने लगी, “ है युगों-युगों तक अमर कवि की वाणी! ” सच में अटल की विदेश-नीति से भले कोई इत्तेफ़ाक़ न रखे पर “ आओ मन की गांठे खोलें.... ” पर किसी को ऐतराज नहीं।
- यदि यहाँ मे अनुवांशिक-राजतंत्र ही रखना था तो क्या ज़रूरत थी राजा-महाराजा और नेपाल मे भी वकालत की? मंथन-बैठक मे विदेश-नीति बदलाव, उच्च-शिक्षा-शोध, प्रतिभा-पलायन, महागाई, क़ानून-व्यवस्था-सुधार, सरकारी-अस्पतालों से डॉक्टरों का पलायन आदि विषयों पर कुछ भी चर्चा क्यों नहीं हुई?