सायणाचार्य वाक्य
उच्चारण: [ saayenaachaarey ]
उदाहरण वाक्य
- तैत्तिरीयारण्यक-भाष्यभूमिका में सायणाचार्य का कथन है कि अरण्यों अर्थात् वनों में पढ़े-पढ़ाये जाने के कारण ' आरण्यक ' नामकरण सम्पन्न हुआ-' अरण्याध्ययना-देतदारण्यकमितीर्यते।
- ऐतरेय ब्राह्मण नामक ग्रंथ के उक्त अंश का भाष्य करते हुए एक पुराने और विद्वान कहे जाने वाले भाष्यकार, सायणाचार्य ने एक प्राचीन श् लोक उद्धरित किया है:
- 3) । सायणाचार्य ने अपने ऋग्भाष्य में “आर्य' का अर्थ विज्ञ, यज्ञ का अनुष्ठाता, विज्ञ स्तोता, विद्वान् आदरणीय अथवा सर्वत्र गंतव्य, उत्तमवर्ण, मनु, कर्मयुक्त और कर्मानुष्ठान से श्रेष्ठ आदि किया है।
- * प्रो 0 विल्सन लिखते हैं कि ' सायणाचार्य का वेद विषयक ज्ञान अति विशाल और अति गहन है, जिसकी समकक्षता का दावा कोई भी यूरोपीय विद्वान नहीं कर सकता।
- इस उपनिषद् के बहुत से भाष्यों, टीकाओं और वृत्तियों में शांकरभाष्य प्रधान है जिसपर आनंद तीर्थ और रंगरामानुज की टीकाएँ प्रसिद्ध हैं एवं सायणाचार्य और आनंदतीर्थ के पृथक् भाष्य भी सुंदर हैं।
- ' इसी प्रकार पाश्चात्त्य वेद विद्वान वेबर, बेनफी, राथ, ग्राम्सन, लुडविग, ग्रिफिथ, कीथ तथा विंटरनित्ज आदि ने सायणाचार्य के वेद विचारों का ही प्रतिपादन किया है।
- सायणाचार्य के अनुसार तैत्तिरीय-आरण्यक के रूप में प्रख्यात कृष्णयजुर्वेदीय आरण्यक के दृष्टा ऋषि कठ हैं-इस प्रकार इसे काठक-आरण्यक के नाम से अभिहित किया जाना चाहिए-
- इस उपनिषद् के बहुत से भाष्यों, टीकाओं और वृत्तियों में शांकरभाष्य प्रधान है जिसपर आनंद तीर्थ और रंगरामानुज की टीकाएँ प्रसिद्ध हैं एवं सायणाचार्य और आनंदतीर्थ के पृथक् भाष्य भी सुंदर हैं।
- मनु की पुत्री ‘ इडा ' का वर्णन करते हुए तैत्तिरीय 1-1-4 में उसे ‘ यज्ञान्काशिनी ' बताया है यज्ञान्काशीनी का अर्थ सायणाचार्य ने ‘ यज्ञ तत्त्व प्रकाशन समर्था ' किया है।
- इनमें से ४ १ स्थानों पर इस शब्द की व्याख्या सायणाचार्य द्वारा वैदिक निघण्टु के अनुरूप ही क्रोध अर्थ में की गई है, दो स्थानों पर तेजस् रूप में तथा तीन स्थानों पर स्तोत्र रूप में। ”