स्वदेश भारती वाक्य
उच्चारण: [ sevdesh bhaareti ]
उदाहरण वाक्य
- उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान से चौथे सप्तक के कवि एवं राष्ट्रीय हिंदी अकादमी के अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती को मई, २ ०० ९ में सम्मानित किया गया था।
- मुख्य अतिथियों एवं उपस्थित प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी रूपाम्बरा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कविवर स्वदेश भारती ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि भाषा एवं साहित्य संस्कृति की नदी के दो तट होते हैं।
- अंक में प्रकाशित कविताओं में रामकुमार कृषक, स्वदेश भारती, रामशंकर चंचल, विभारानी, मधुरेश जी, कैलाश पचैरी, रोहिताश्व आस्थाना, कमल सिंह चैहान तथा डाॅ. सुनील अग्रवाल की रचनाएं प्रभावशाली हैं।
- दिनांक 6 मार्च 2012 को सिंघई विला भिलाई (छत्तीसगढ़) में कवि एवं उपन्यासकार स्वदेश भारती के ताजा उपन्यास आरण्यक पर विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कवि एवं आलोचक अशोक सिंघई ने उपन्यास पर आलेख पाठ किया।
- समापन सत्र के अंत में मुख्य अतिथियों प्रतिभागियों, मीडिया एवं सिक्किम, गान्तोक के विशिष्ट अतिथियों को सम्बोधित करते हुए अकादमी अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती ने कहा कि भाषा साहित्य के बिना जीवन शून्य तथा जर्जर होता है।
- स्वदेश भारती ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि कोई भी भाषा बोलियों के अन्तरसंबंधों से पोषित होती है उसमें जनजीवन के भाषाई संस्कार का प्रभाव पड़ता है तथा अनेक शब्द लोक जीवन की बहुत सारी सांस्कृतिक गतिविधियों से जन्म लेते है।
- उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान सहित अनेकों राष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित चौथे सप्तक के कवि डॉ. स्वदेश भारती के अब तक 24 काव्य संकलन 8 उपन्यास प्रकाशित हैं तथा 40 से अधिक ग्रन्थों का उन्होंने सम्पादन भी किया है।
- नवगठित संस्थान साहित्य की चौपाल, छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, कोलकाता के अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती के नक्सली समस्या पर केन्द्रित सद्य प्रकाशित उपन्यास आरण्यक पर सिंघई विला, भिलाई में 6 मार्च, 2012 को समीक्षा संगोष्ठी सम्पन्न हुई।
- स्वदेश भारती कोलकाता-12. 05.12 अस्वस्थ शरीर अस्वस्थयता शरीर को पंगु बना देती है मन में एक विषाद भर जाता है जब हाथ पांव काम नहीं करते और आंतों में भर जाता है अपरूप धुंआ जीवन का आनन्द घायल हारिल पंछी तरह उड़ नहीं पाता जब सूखने लगता है रुग्ण-सूखा तन
- स्वदेश भारती कोलकाता-15. 05.12 अक्षरज्ञान का अधूरापन अक्षरज्ञानी, विज्ञानी, उपदेशक, मार्गदर्शक अपने को पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाता यही एक कारण है जो उसकी मन-बुद्धि को सताता जीवनपर्यन्त, जितना भी चाहे जिए, मरे, चेष्टाएं करे, जितना भी ज्ञान-रस जीवन के रिक्त-कलश में भरे किन्तु वह आधा-अधूरा ही होता है वही फसल काटता है, जो बोता है।